पिंडदान और पितृ तर्पण के लिए गया से भी अधिक पुण्यदायी क्यों माना जाता है त्रिशूल भेद?
मध्य प्रदेश के जबलपुर स्थित लम्हेटाघाट का त्रिशूल भेद मंदिर और तिलवाराघाट के समीप स्थित मार्कण्डेय धाम देशभर के श्रद्धालुओं के लिए गहरी आस्था का केंद्र हैं। हर वर्ष आषाढ़ अमावस्या के अवसर पर यहां हजारों श्रद्धालु पितृ तर्पण, पिंडदान, कालसर्प दोष निवारण पूजा और अन्य धार्मिक अनुष्ठानों के लिए पहुंचते हैं।
धार्मिक मान्यता है कि इन पवित्र स्थलों पर श्रद्धापूर्वक किए गए कर्मकांड से पितरों की आत्मा को शांति मिलती है और परिवार में सुख-समृद्धि का आशीर्वाद प्राप्त होता है। इसी कारण आगामी 14 जुलाई को आषाढ़ कृष्ण अमावस्या के अवसर पर यहां बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के पहुंचने की संभावना है।
त्रिशूल भेद तीर्थ का धार्मिक महत्व
त्रिशूल भेद मंदिर को भारत के प्राचीन और अत्यंत पवित्र तीर्थों में गिना जाता है। पौराणिक मान्यता के अनुसार यहां किया गया पिंडदान और पितृ तर्पण अत्यंत पुण्यदायी माना जाता है।
धार्मिक ग्रंथों में वर्णित मान्यताओं के अनुसार इस तीर्थ पर किए गए पितृ कर्मों का फल अत्यंत श्रेष्ठ माना गया है। इसी वजह से देशभर से श्रद्धालु अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए यहां पहुंचते हैं।
स्कंद पुराण में मिलता है उल्लेख
स्कंद पुराण के अनुसार इस तीर्थ का उल्लेख त्रिपुरी तीर्थ के रूप में मिलता है। धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक अयोध्या के राजा मनु, राजा हिरण्यतेजा और राजा पुरूरवा ने भी इसी पवित्र स्थल पर अपने पितरों का तर्पण किया था।
इसी कारण यह स्थान सनातन परंपरा में विशेष महत्व रखता है और पितृ कर्मों के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है।
मार्कण्डेय धाम में कालसर्प दोष निवारण पूजा
त्रिशूल भेद मंदिर के साथ ही मार्कण्डेय धाम भी श्रद्धालुओं के बीच विशेष आस्था का केंद्र है। यहां कालसर्प दोष निवारण, महामृत्युंजय जाप, रुद्राभिषेक और अन्य वैदिक अनुष्ठान कराए जाते हैं।
मान्यता है कि विधि-विधान से पूजा करने पर जीवन की अनेक बाधाएं दूर होती हैं तथा ग्रह दोषों का प्रभाव कम होता है। यही कारण है कि हर अमावस्या और विशेष पर्वों पर यहां श्रद्धालुओं की भीड़ लगी रहती है।




