रिपोर्टर केशव राज सैन के अनुसार जिले के निजी शिक्षण संस्थानों के संचालकों ने सोमवार को आरटीई जांच विभागीय टाइम फ्रेम के खिलाफ किए गए आदेशों के विरोध में जिला कलेक्टर टोंक को मुख्यमंत्री के नाम ज्ञापन सौंपा।
स्कूल शिक्षा परिवार टोंक ने अतिरिक्त मुख्य सचिव स्कूल शिक्षा के पत्र का हवाला देते हुए इस आदेश का विरोध किया है। ज्ञापन में कहा गया कि आरटीई के तहत प्रत्येक वर्ष विद्यार्थियों का भौतिक सत्यापन राजपत्रित अधिकारियों और कर्मचारियों द्वारा किया जाता है, जिसमें जाति प्रमाण पत्र, आय प्रमाण पत्र, जन्म प्रमाण पत्र, निवास प्रमाण पत्र सहित सभी दस्तावेजों की गहन जांच के बाद सत्यापन किया जाता है।
इसके अलावा आधार कार्ड और जन आधार कार्ड के माध्यम से भी विद्यार्थियों का सत्यापन किया जाता है तथा विभागीय पोर्टल पर भी इसकी पुष्टि होती है। इसके बावजूद शिक्षा विभाग द्वारा 20 प्रतिशत पुनः निरीक्षण कराया जाता है। निजी स्कूल संचालकों का कहना है कि बार-बार जांच से विद्यालयों की शैक्षणिक गतिविधियों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
उन्होंने कहा कि पुनः जांच का कोई औचित्य नहीं रह जाता और यह विभागीय अधिकारियों पर अविश्वास दर्शाता है, जिससे समय और सरकारी धन की बर्बादी होती है। साथ ही इससे निजी विद्यालयों की स्वायत्तता प्रभावित होती है और लालफीताशाही व भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिलने की आशंका रहती है।
ज्ञापन में मुख्यमंत्री से मांग की गई कि आरटीई के तहत विभागीय टाइम फ्रेम के अनुसार ही जांच कराई जाए।
इसके अलावा स्कूल शिक्षा परिवार टोंक ने एक अन्य ज्ञापन में विद्यालय समय में अवैध कोचिंग संस्थानों के संचालन पर सख्त कार्रवाई की मांग की है। साथ ही कुछ विद्यालयों द्वारा मान्यता शर्तों और स्वीकृत स्थान के विरुद्ध संचालन कर विद्यार्थियों को गुमराह करने की शिकायत भी की गई है।
ज्ञापन में यह भी बताया गया कि जिले में आरटीई के अंतर्गत कई विद्यार्थियों की शुल्क प्रतिपूर्ति राशि लंबित है, जिससे विद्यालयों को आर्थिक संकट का सामना करना पड़ रहा है। लगातार अवगत कराने के बावजूद भुगतान नहीं होने से शैक्षणिक और प्रशासनिक व्यवस्था प्रभावित हो रही है।
संस्था ने मांग की कि सभी लंबित बिलों का शीघ्र भुगतान किया जाए और भुगतान प्रक्रिया में आ रही बाधाओं को दूर किया जाए, ताकि विद्यालयों को राहत मिल सके और विद्यार्थियों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्राप्त हो सके।




