Supreme Court on Death Penalty: फांसी के तरीके पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने मौत की सजा देने के लिए भारत में इस्तेमाल होने वाली फांसी की मौजूदा व्यवस्था को खत्म करने की मांग वाली याचिका खारिज कर दी है। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने कहा कि फिलहाल ऐसा पर्याप्त आधार नहीं है, जिसके चलते फांसी की मौजूदा व्यवस्था को असंवैधानिक घोषित किया जा सके।
हालांकि, कोर्ट ने यह भी साफ किया कि याचिका खारिज होने का मतलब यह नहीं है कि भविष्य में इस मुद्दे की संवैधानिक समीक्षा नहीं हो सकती। अगर आगे चलकर ठोस वैज्ञानिक, मेडिकल या अनुभवजन्य सबूत सामने आते हैं, तो फांसी के तरीके पर दोबारा विचार किया जा सकता है।
याचिका में फांसी की जगह दूसरे तरीकों की मांग
यह याचिका वरिष्ठ वकील ऋषि मल्होत्रा ने 2017 में दाखिल की थी। याचिका में फांसी को क्रूर, अमानवीय और दर्दनाक बताते हुए मौत की सजा लागू करने के लिए दूसरे तरीकों पर विचार करने की मांग की गई थी।
याचिका में जहरीले इंजेक्शन और गोली मारने समेत चार वैकल्पिक तरीकों का सुझाव दिया गया था। याचिकाकर्ता ने दलील दी थी कि मौत की सजा पाए कैदियों को कम पीड़ा देने वाले तरीके उपलब्ध होने चाहिए।
याचिका में CrPC की धारा 354(5) को भी चुनौती दी गई थी। इसी प्रावधान के तहत मौत की सजा पाए व्यक्ति को गर्दन से तब तक लटकाने का प्रावधान है, जब तक उसकी मौत न हो जाए।
याचिकाकर्ता ने फांसी की प्रक्रिया को संविधान के अनुच्छेद 21 में दिए गए जीवन और गरिमा के अधिकार के खिलाफ बताया था।
सुप्रीम कोर्ट ने विशेषज्ञ समिति का सुझाव दिया
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में केंद्र सरकार के लिए एक महत्वपूर्ण सुझाव भी दिया है। कोर्ट ने कहा कि केंद्र चाहे तो विशेषज्ञों की एक समिति बनाकर मौत की सजा देने के मौजूदा तरीके की व्यापक समीक्षा करा सकता है।
विशेषज्ञ समिति यह देख सकती है कि क्या कोई वैकल्पिक तरीका ऐसा है, जिससे दोषी को अनावश्यक पीड़ा कम हो और उसकी गरिमा भी बनी रहे।
इससे साफ है कि कोर्ट ने फिलहाल फांसी की व्यवस्था को असंवैधानिक घोषित करने से इनकार किया है, लेकिन मौत की सजा लागू करने के तरीके पर वैज्ञानिक और मेडिकल आधार पर भविष्य में चर्चा की संभावना खुली रखी है।
केंद्र सरकार ने फांसी का किया था बचाव
इस मामले में केंद्र सरकार पहले भी मौजूदा फांसी की व्यवस्था का बचाव कर चुकी है। 2018 में गृह मंत्रालय ने सुप्रीम कोर्ट में दिए हलफनामे में कहा था कि फांसी से मौत तेज और आसान तरीके से होती है और इससे कैदी को अनावश्यक पीड़ा नहीं होती।
केंद्र ने जहरीले इंजेक्शन और गोली मारने जैसे विकल्पों को भी फांसी से कम पीड़ादायक मानने से इनकार किया था।
2023 में सुप्रीम कोर्ट ने मांगा था डेटा
मौत की सजा देने के तरीके को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने मार्च 2023 में केंद्र सरकार से फांसी से जुड़ा बेहतर डेटा मांगा था। कोर्ट ने मौत में लगने वाले समय और फांसी के दौरान होने वाली संभावित पीड़ा से संबंधित जानकारी पर भी विचार किया था।



