सुप्रीम कोर्ट में शिवसेना नाम-निशान विवाद की सुनवाई, उद्धव ठाकरे पक्ष ने रखीं अहम दलीलें
नई दिल्ली: शिवसेना के नाम और चुनाव चिन्ह 'धनुष-बाण' को लेकर चल रहे लंबे कानूनी विवाद में सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान उद्धव ठाकरे गुट की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने विस्तृत दलीलें पेश कीं। सुनवाई के दौरान अदालत ने वर्ष 2022 की राजनीतिक घटनाओं का क्रमवार विवरण मांगा, जिसके बाद सिब्बल ने शिवसेना के संगठनात्मक ढांचे और पार्टी संविधान में समय-समय पर हुए बदलावों का उल्लेख किया।
सिब्बल ने अदालत को बताया कि वर्ष 1999 तक शिवसेना के संविधान में "पक्ष प्रमुख" (Party Chief) जैसा कोई पद नहीं था। बाद में संगठनात्मक जरूरतों को देखते हुए इस पद को पार्टी संविधान में शामिल किया गया। उन्होंने कहा कि पार्टी के आंतरिक ढांचे में हुए ये बदलाव संविधान और संगठनात्मक प्रक्रिया के अनुरूप थे।
सुनवाई के दौरान कपिल सिब्बल ने 2012 के बाद हुए महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों का भी उल्लेख किया। उन्होंने अदालत के सामने विभिन्न चुनावों में शिवसेना को मिली सीटों और जनता के समर्थन का ब्यौरा रखते हुए तर्क दिया कि पार्टी की संगठनात्मक पहचान और जनाधार को केवल विधायकों की संख्या के आधार पर नहीं आंका जा सकता। उनका कहना था कि पार्टी का वास्तविक स्वरूप उसके संविधान, संगठन और कार्यकर्ताओं से तय होता है।
अदालत ने सुनवाई के दौरान 27 फरवरी से जुड़े घटनाक्रम की जानकारी भी मांगी। इसके जवाब में सिब्बल ने विस्तार से बताया कि किस प्रकार राजनीतिक घटनाओं और संगठनात्मक फैसलों के बाद यह विवाद सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा। उन्होंने कहा कि पूरे मामले को केवल विधायी बहुमत के नजरिए से नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि पार्टी के मूल संविधान और संगठनात्मक संरचना को भी समान महत्व दिया जाना चाहिए।
यह मामला 2022 में शिवसेना में हुए बड़े राजनीतिक विभाजन के बाद शुरू हुआ था, जब एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में बड़ी संख्या में विधायक अलग हो गए थे। इसके बाद चुनाव आयोग ने शिंदे गुट को मूल शिवसेना का नाम और 'धनुष-बाण' चुनाव चिन्ह आवंटित किया। उद्धव ठाकरे गुट ने इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी, जहां मामले की अंतिम सुनवाई जारी है।




