सबा पटौदी ने परिवार के धर्म को लेकर किया बड़ा खुलासा
सैफ अली खान की बहन सबा अली खान पटौदी ने हाल ही में अपने परिवार और धर्म को लेकर कई बातें साझा की हैं। एक बातचीत के दौरान सबा ने अपने बचपन, माता-पिता की सोच और परिवार में धर्म को लेकर अपनाए गए तरीके के बारे में बताया। उन्होंने कहा कि उनकी मां और मशहूर अभिनेत्री शर्मिला टैगोर ने उन्हें और उनके भाई-बहनों को इस्लाम की बुनियादी बातें समझाईं।
सबा के मुताबिक, उनके माता-पिता की अलग-अलग धार्मिक पृष्ठभूमि थी, लेकिन घर में धर्म को लेकर किसी तरह का दबाव नहीं बनाया गया। बच्चों को अपनी आस्था और सोच को समझने और आगे चलकर खुद फैसला करने की आजादी दी गई।
शर्मिला टैगोर ने बच्चों को इस्लाम की जानकारी दी
सबा ने बताया कि शादी के बाद शर्मिला टैगोर ने इस्लाम को अपनाया था और इसके बाद उन्होंने अपने बच्चों को भी इस धर्म की परंपराओं और मान्यताओं से परिचित कराया। सबा ने कहा कि उनकी मां ने उन्हें रमजान और इस्लाम से जुड़ी जरूरी बातें समझाईं।
उनका कहना है कि परिवार में धर्म को लेकर बातचीत होती थी, लेकिन किसी पर कोई फैसला थोपा नहीं जाता था। बच्चों को यह समझने का मौका दिया गया कि उनकी आस्था उनके लिए क्या मायने रखती है।
धर्म को लेकर नहीं था कोई दबाव
सबा ने यह भी साफ किया कि उनके माता-पिता ने कभी बच्चों को किसी खास धार्मिक सोच को अपनाने के लिए मजबूर नहीं किया। परिवार में हर व्यक्ति को अपनी व्यक्तिगत मान्यता रखने की आजादी थी।
उन्होंने बताया कि वह खुद को धार्मिक और आध्यात्मिक मानती हैं और इस्लाम से उनका गहरा जुड़ाव है। हालांकि, परिवार के दूसरे सदस्यों की अपनी अलग सोच और मान्यताएं हो सकती हैं।
सैफ और सोहा की शादी का भी दिया उदाहरण
अपने भाई सैफ अली खान और बहन सोहा अली खान का उदाहरण देते हुए सबा ने बताया कि दोनों ने अलग धार्मिक पृष्ठभूमि वाले परिवारों में शादी की है। उनके मुताबिक, इससे साफ होता है कि पटौदी परिवार में आस्था को हमेशा निजी फैसला माना गया है।
सबा का मानना है कि धर्म किसी भी व्यक्ति का निजी विषय है और इसे किसी दूसरे पर थोपना सही नहीं है। परिवार में अलग-अलग सोच और मान्यताओं के बावजूद सभी एक-दूसरे का सम्मान करते हैं।
पटौदी परिवार में मनाए जाते हैं अलग-अलग त्योहार
सबा ने बताया कि उनका परिवार बचपन से ही अलग-अलग त्योहारों के माहौल में बड़ा हुआ। परिवार में क्रिसमस, दिवाली और होली जैसे त्योहारों की खुशियां भी साझा की जाती थीं।



