डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपये पर दबाव लगातार बढ़ता जा रहा है और अब विशेषज्ञों ने बड़ी आशंका जताई है। उनका कहना है कि यदि वैश्विक परिस्थितियां इसी तरह बनी रहती हैं, तो रुपया जल्द ही 100 प्रति डॉलर के स्तर को पार कर सकता है, जो भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए गंभीर संकेत होगा।
विशेषज्ञों के अनुसार, खासतौर पर अमेरिका-ईरान के बीच बढ़ते तनाव और अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में उछाल रुपये की कमजोरी का मुख्य कारण बन रहे हैं। भारत अपनी तेल जरूरतों के लिए बड़े पैमाने पर आयात पर निर्भर है, ऐसे में तेल महंगा होने से चालू खाता घाटा और महंगाई दोनों बढ़ने का खतरा रहता है।
पिछले एक साल में रुपये में करीब 10 फीसदी तक गिरावट दर्ज की जा चुकी है। हालांकि, इस गिरावट को नियंत्रित करने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने कई कदम उठाए हैं, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि ये उपाय केवल अस्थायी राहत देने वाले हैं।
RBI ने बैंकों के लिए नेट ओपन पोजीशन (NOP) की सीमा तय कर दी है, जिससे वे डॉलर के मुकाबले बड़े दांव नहीं लगा पाएंगे। इस कदम का उद्देश्य रुपये में अत्यधिक उतार-चढ़ाव को रोकना है। इसके बावजूद बाजार में अनिश्चितता बनी हुई है।
वित्तीय विश्लेषकों का कहना है कि अगर वैश्विक हालात—विशेषकर युद्ध और तेल संकट—लंबे समय तक जारी रहते हैं, तो रुपये पर दबाव और बढ़ेगा। ऐसे में यह 95 के स्तर से नीचे गिरकर 100 के आंकड़े को छू सकता है।
इसके अलावा विदेशी निवेशकों की लगातार बिकवाली भी रुपये की स्थिति को कमजोर कर रही है। जब तक विदेशी निवेश वापस नहीं आता और कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट नहीं होती, तब तक रुपये के लिए स्थिति चुनौतीपूर्ण बनी रह सकती है।
आर्थिक जानकारों का यह भी कहना है कि मौजूदा कदमों से बाजार को थोड़ी स्थिरता मिल सकती है, लेकिन दीर्घकालिक समाधान के लिए मजबूत आर्थिक नीतियों और वैश्विक स्थिरता की आवश्यकता होगी।




