राजस्थान पंचायत चुनाव में कई जगह चौंकाने वाले नतीजे
राजस्थान में पंचायत चुनाव के नतीजों के बाद कई गांवों में सियासी समीकरण बदलते नजर आए हैं। कहीं राजनीतिक परिवारों के उम्मीदवारों को जीत मिली, तो कहीं सांसद और विधायकों के रिश्तेदारों को हार का सामना करना पड़ा। इन नतीजों ने दिखाया कि स्थानीय चुनावों में बड़े नेताओं का प्रभाव होने के बावजूद जीत की गारंटी नहीं होती।
डूंगरपुर में सांसद राजकुमार रोत के चाचा चुनाव हार गए। नागौर जिले की एक ग्राम पंचायत में खींवसर विधायक रेवंतराम डांगा के भतीजे को भी हार मिली। वहीं, जोधपुर जिले में लाखों सोशल मीडिया फॉलोअर्स वाले इन्फ्लुएंसर ओम प्रकाश बिश्नोई को सरपंच चुनाव में सिर्फ 33 वोट मिले।
सांसद राजकुमार रोत के चाचा 15 वोटों से हारे
डूंगरपुर जिले की खरवरखुनिया ग्राम पंचायत में भारत आदिवासी पार्टी के सांसद राजकुमार रोत के चाचा सोहनलाल को सरपंच चुनाव में हार का सामना करना पड़ा। यहां भगवतीलाल खराड़ी ने उन्हें 15 वोटों से हराया।
यह नतीजा इसलिए चर्चा में रहा, क्योंकि खरवरखुनिया सांसद राजकुमार रोत की गृह पंचायत है। ऐसे में उनके चाचा की हार को स्थानीय राजनीति के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
हालांकि, ग्राम पंचायत चुनाव में मतदाताओं का फैसला कई स्थानीय कारणों पर निर्भर करता है। केवल किसी बड़े नेता से पारिवारिक संबंध होने से चुनाव जीतना तय नहीं होता।
खींवसर विधायक के भतीजे को भी नहीं मिली जीत
नागौर जिले की मुदियाड़ ग्राम पंचायत में भी चुनावी मुकाबला चर्चा में रहा। यहां खींवसर विधायक रेवंतराम डांगा के भतीजे नरेश सरपंच पद का चुनाव हार गए। रिपोर्ट के मुताबिक, उन्हें 38 वोटों के अंतर से हार का सामना करना पड़ा।
इस नतीजे ने एक बार फिर स्थानीय चुनावों में जनसंपर्क और मतदाताओं के फैसले की अहमियत को सामने रखा है। विधानसभा स्तर की राजनीति में प्रभाव रखने वाले नेताओं के परिवारों को भी पंचायत चुनाव में मतदाताओं के बीच अपना समर्थन साबित करना पड़ता है।
21 लाख फॉलोअर्स, लेकिन सरपंच चुनाव में सिर्फ 33 वोट
पंचायत चुनाव का एक और नतीजा सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बना हुआ है। जोधपुर जिले की ओसियां तहसील की इंदों की ढाणी ग्राम पंचायत से सरपंच पद का चुनाव लड़ने वाले इन्फ्लुएंसर ओम प्रकाश बिश्नोई को महज 33 वोट मिले।
रिपोर्टों के अनुसार, इंस्टाग्राम, फेसबुक और यूट्यूब को मिलाकर उनके सोशल मीडिया पर 21 लाख से अधिक फॉलोअर्स और सब्सक्राइबर्स हैं। इसके बावजूद करीब 1,600 मतदाताओं वाली पंचायत में उन्हें बहुत कम वोट मिले।
ओम प्रकाश बिश्नोई ने चुनाव में नशामुक्ति को प्रमुख मुद्दा बनाया था। लेकिन उनकी डिजिटल लोकप्रियता स्थानीय चुनाव में पर्याप्त समर्थन में नहीं बदल सकी।



