अरशद वारसी की दमदार एक्टिंग के बावजूद कमजोर स्क्रीनप्ले और धीमी रफ्तार ने सीरीज का असर कम कर दिया।
जब किसी प्रोजेक्ट से राजकुमार हिरानी का नाम जुड़ता है तो दर्शकों की उम्मीदें स्वतः बढ़ जाती हैं। वहीं अरशद वारसी, विक्रांत मैसी, बोमन ईरानी और मोना सिंह जैसे अनुभवी कलाकार मौजूद हों तो बेहतरीन मनोरंजन की उम्मीद और मजबूत हो जाती है। जियोहॉटस्टार पर रिलीज हुई वेब सीरीज 'प्रीतम एंड पेड्रो' साइबर क्राइम, कॉमेडी, थ्रिल और इमोशन का मिश्रण पेश करने की कोशिश करती है, लेकिन कमजोर स्क्रीनप्ले और धीमी रफ्तार इसकी सबसे बड़ी कमजोरी बन जाती है। दैनिक भास्कर ने इस सीरीज को 5 में से 2.5 स्टार दिए हैं।
कहानी कैसी है?
सीरीज की कहानी गोवा में सेट है, जहां अनुभवी पुलिस अधिकारी पेड्रो गोंसाल्वेस (अरशद वारसी) का तबादला साइबर सेल में होता है। यहां उनकी मुलाकात युवा और टेक-सेवी अधिकारी प्रीतम पार्कर (वीर हिरानी) से होती है।
दोनों की कार्यशैली एक-दूसरे से बिल्कुल अलग है। जहां पेड्रो अनुभव और पारंपरिक जांच पर भरोसा करता है, वहीं प्रीतम आधुनिक तकनीक, डेटा और हैकिंग के जरिए अपराधों की गुत्थियां सुलझाता है। मंत्री के बेटे के अपहरण और हाई-प्रोफाइल साइबर क्राइम की जांच के दौरान कहानी में कई डिजिटल फ्रॉड और साइबर अपराध सामने आते हैं। हालांकि, मजबूत विषय होने के बावजूद कहानी अपनी पकड़ लगातार बनाए रखने में सफल नहीं हो पाती।
एक्टिंग कैसी है?
पूरी सीरीज में अरशद वारसी सबसे प्रभावशाली नजर आते हैं। उनकी कॉमिक टाइमिंग, सहज अभिनय और स्क्रीन प्रेजेंस कई कमजोर दृश्यों को भी संभाल लेती है।
वीर हिरानी ने इस सीरीज से बतौर लीड अभिनेता डेब्यू किया है। उन्होंने अपने किरदार के साथ ईमानदारी दिखाई है, लेकिन भावनात्मक दृश्यों में अनुभव की कमी साफ दिखाई देती है।
विक्रांत मैसी, मोना सिंह, बोमन ईरानी, सत्यदीप मिश्रा और श्रुति मराठे अपने-अपने किरदारों में प्रभाव छोड़ते हैं, लेकिन कमजोर स्क्रिप्ट उन्हें ज्यादा अवसर नहीं देती।
निर्देशन और तकनीकी पक्ष
निर्देशक अविनाश अरुण ने इससे पहले कई बेहतरीन प्रोजेक्ट्स दिए हैं, लेकिन इस बार वे कहानी की गति और प्रभाव बनाए रखने में पूरी तरह सफल नहीं दिखते।
राजकुमार हिरानी, अभिजात जोशी, सुयश त्रिवेदी और अमित दुबे द्वारा लिखी कहानी का विषय समकालीन और प्रासंगिक है, लेकिन स्क्रीनप्ले कई जगह अनावश्यक रूप से लंबा महसूस होता है। थ्रिल लगातार नहीं बन पाता और इमोशनल दृश्य भी अपेक्षित असर छोड़ने में नाकाम रहते हैं।




