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फिलीपींस में खनन के दौरान मिले 10000 साल पुराने त्रिशूल वज्र

फिलीपींस में खनन के दौरान मिले प्राचीन त्रिशूल और वज्र पर भारतीय शोधकर्ता ने बड़ा दावा किया, जिससे प्राचीन भारतीय संस्कृति के वैश्विक प्रभाव पर बहस तेज

Enews Bharat20 March 2026
फिलीपींस में खनन के दौरान मिले 10000 साल पुराने त्रिशूल वज्र

फिलीपींस में एक खनन अभियान के दौरान मिली कुछ रहस्यमयी धातु कलाकृतियों ने इतिहास और धर्म से जुड़े नए सवाल खड़े कर दिए हैं। भारतीय शोधकर्ता सैयद शमीम हुसैन ने दावा किया है कि उन्हें यहां से सनातन परंपरा से जुड़े प्रतीक—त्रिशूल और वज्र—मिले हैं, जो हजारों साल पुराने हो सकते हैं।

नई दिल्ली में आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में हुसैन ने बताया कि ये खोज उन्होंने साल 2015 में फिलीपींस में खनन कार्य के दौरान की थी। उनके अनुसार, एक वस्तु का आकार त्रिशूल जैसा है, जबकि दूसरी वज्र के समान दिखाई देती है। उन्होंने दावा किया कि त्रिशूल लगभग 10,000 वर्ष पुराना हो सकता है, जबकि वज्र करीब 3,000 वर्ष पुराना है।

कैसे मिलीं ये कलाकृतियां?

हुसैन के मुताबिक, जब वे स्थानीय टीम के साथ खनन कार्य कर रहे थे, तब कुछ असामान्य धातु वस्तुएं मिलीं। जांच के दौरान पाया गया कि ये वस्तुएं सामान्य खनिजों से अलग थीं। बाद में इन्हें भारत लाकर कई वर्षों तक अध्ययन किया गया और विशेषज्ञों से राय ली गई।

उन्होंने यह भी बताया कि इन कलाकृतियों को भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण में पंजीकृत कराने की प्रक्रिया भी की गई है।

धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व

सनातन धर्म में त्रिशूल को भगवान शिव का प्रमुख हथियार माना जाता है, जो सृजन, पालन और संहार का प्रतीक है। वहीं वज्र, देवराज इंद्र का अस्त्र है, जो शक्ति, ऊर्जा और आकाशीय नियंत्रण का प्रतिनिधित्व करता है।

यदि ये कलाकृतियां वास्तव में प्राचीन साबित होती हैं, तो यह खोज भारतीय संस्कृति के वैश्विक प्रभाव को और मजबूत कर सकती है।

क्या कहता है इतिहास?

इतिहासकारों का मानना है कि प्राचीन समय में भारत और दक्षिण-पूर्व एशिया के बीच गहरे सांस्कृतिक और व्यापारिक संबंध थे। इंडोनेशिया, कंबोडिया, थाईलैंड जैसे देशों में आज भी भारतीय संस्कृति के कई प्रमाण मौजूद हैं—जैसे मंदिर, मूर्तियां और संस्कृत के प्रभाव।

ऐसे में फिलीपींस से इस तरह की वस्तुओं का मिलना यह संकेत दे सकता है कि भारत का सांस्कृतिक प्रभाव इस क्षेत्र में पहले से कहीं अधिक व्यापक था।

विशेषज्ञों की नजर में सवाल

हालांकि, इस दावे को लेकर विशेषज्ञों में मतभेद भी है। कई पुरातत्वविदों का मानना है कि इतनी प्राचीनता के दावों की वैज्ञानिक पुष्टि जरूरी है। कार्बन डेटिंग और अन्य परीक्षणों के बाद ही इन कलाकृतियों की असल उम्र और महत्व स्पष्ट हो पाएगा।

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फिलहाल, यह खोज इतिहास, धर्म और विज्ञान के बीच एक नई बहस को जन्म दे रही है।


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