जैन धर्म में पर्युषण पर्व को आत्मचिंतन, संयम और धर्म साधना का विशेष पर्व माना जाता है। इन दिनों जैन मंदिरों में सुबह से ही श्रद्धालुओं की चहल-पहल देखने को मिलती है। पूजा-पाठ और धार्मिक कार्यक्रमों के साथ मंदिरों में होने वाली आंगी सजावट भी लोगों के आकर्षण का केंद्र रहती है।
पर्युषण पर्व के दौरान कई जैन मंदिरों में भगवान की प्रतिमा को हर दिन अलग-अलग तरीके से सजाया जाता है। इसे आंगी कहा जाता है। खास बात यह होती है कि हर दिन भगवान का रूप और सजावट पहले दिन से अलग दिखाई देती है।
क्या होती है आंगी सजावट?
आंगी का मतलब भगवान की प्रतिमा को विशेष तरीके से सजाना और नया स्वरूप देना है। इसमें फूलों, वस्त्रों, आभूषणों और अलग-अलग सजावटी सामग्री का इस्तेमाल किया जाता है।
कई जगहों पर आंगी तैयार करने में काफी समय लगता है। सजावट करने वाले लोग बेहद बारीकी से प्रतिमा के आसपास की पूरी व्यवस्था तैयार करते हैं, ताकि मंदिर में आने वाले श्रद्धालुओं को भगवान का आकर्षक स्वरूप देखने को मिले।
कई मंदिरों में आंगी का विषय पहले से तय किया जाता है। उसी के अनुसार रंग, फूल, वस्त्र और दूसरी सजावटी चीजों का इस्तेमाल किया जाता है।
10 दिनों में 10 अलग-अलग रूप
पर्युषण पर्व के दौरान हर दिन की आंगी को खास बनाने की कोशिश की जाती है। एक दिन भगवान का स्वरूप फूलों से सजाया जाता है, तो दूसरे दिन अलग रंग और सजावटी सामग्री का इस्तेमाल किया जाता है।
इसी वजह से कई श्रद्धालु रोज मंदिर जाकर आंगी के दर्शन करना पसंद करते हैं। मंदिरों में सुबह की पूजा के समय विशेष भीड़ भी देखने को मिलती है।
आंगी सिर्फ सजावट नहीं, श्रद्धा भी है
जैन समाज में आंगी को केवल सुंदर सजावट के तौर पर नहीं देखा जाता। इसके पीछे श्रद्धा और भक्ति की भावना भी जुड़ी होती है।
आंगी तैयार करने वाले लोग इसे भगवान की सेवा का एक माध्यम मानते हैं। इसके लिए वे पहले से तैयारी करते हैं और कई बार घंटों मेहनत करके सजावट पूरी करते हैं।
मंदिर में प्रतिमा का नया स्वरूप तैयार होने के बाद जब श्रद्धालु दर्शन करते हैं, तो पूरा वातावरण भक्तिमय हो जाता है।
पर्युषण पर्व का असली संदेश क्या है?
पर्युषण पर्व सिर्फ मंदिर जाने और पूजा करने तक सीमित नहीं है। जैन परंपरा में इन दिनों आत्मचिंतन, संयम और अपने व्यवहार को बेहतर बनाने पर विशेष ध्यान दिया जाता है।



