14 साल में महिलाओं के खिलाफ 37 बड़ी वारदातें
देश में महिलाओं और बेटियों की सुरक्षा को लेकर सवाल एक बार फिर गंभीर हो गए हैं। पिछले करीब 14 वर्षों में सामने आए कई चर्चित रेप और यौन हिंसा के मामलों ने समाज, कानून-व्यवस्था और महिला सुरक्षा की तैयारियों पर सवाल खड़े किए हैं। निर्भया कांड से लेकर 2026 के नोएडा कांड तक कई ऐसी घटनाएं सामने आईं, जिन्होंने पूरे देश को झकझोर दिया।
इन घटनाओं के बाद हर बार सख्त कानून, तेज न्याय और महिलाओं की सुरक्षा के बड़े-बड़े दावे किए गए, लेकिन समय बीतने के साथ अलग-अलग हिस्सों से सामने आती घटनाएं यह सवाल खड़ा करती हैं कि आखिर बेटियां कब पूरी तरह सुरक्षित महसूस करेंगी?
निर्भया कांड ने पूरे देश को झकझोर दिया था
साल 2012 में दिल्ली में हुई निर्भया गैंगरेप और हत्या की घटना ने पूरे देश को हिला दिया था। चलती बस में युवती के साथ हुई दरिंदगी के बाद उसकी हालत गंभीर हो गई थी। इलाज के दौरान उसकी मौत हो गई।
इस घटना के बाद देशभर में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुए। महिलाओं की सुरक्षा और यौन अपराधों से जुड़े कानूनों को लेकर व्यापक बहस शुरू हुई। इसके बाद आपराधिक कानूनों में कई महत्वपूर्ण बदलाव किए गए और महिलाओं के खिलाफ अपराधों पर सख्ती बढ़ाने की मांग तेज हुई।
निर्भया कांड को भारत में महिला सुरक्षा से जुड़ी बहस के एक बड़े मोड़ के रूप में देखा जाता है।
कानून बदले, लेकिन अपराध की घटनाएं जारी रहीं
निर्भया कांड के बाद सरकार और कानून-व्यवस्था से जुड़े संस्थानों पर महिलाओं के खिलाफ अपराध रोकने का दबाव बढ़ा। कानूनों में बदलाव किए गए और रेप, यौन उत्पीड़न तथा महिलाओं के खिलाफ हिंसा के मामलों में सजा के प्रावधानों को सख्त किया गया।
इसके बावजूद देश के अलग-अलग हिस्सों से महिलाओं और बच्चियों के खिलाफ गंभीर अपराधों की खबरें सामने आती रहीं।
कभी सार्वजनिक परिवहन में महिला के साथ अपराध हुआ, तो कभी घर, हॉस्टल, स्कूल, कॉलेज या कार्यस्थल से जुड़े मामलों ने चिंता बढ़ाई। कई घटनाओं में आरोपी पीड़िता के परिचित या करीबी भी पाए गए।
हर बड़ी वारदात के बाद उठता है एक ही सवाल
महिलाओं के खिलाफ अपराध की किसी बड़ी घटना के सामने आने के बाद आमतौर पर कुछ सवाल बार-बार उठते हैं।
क्या महिलाओं के लिए सार्वजनिक स्थान पूरी तरह सुरक्षित हैं?
क्या रात के समय बेटियां बिना डर के बाहर निकल सकती हैं?
क्या पुलिस तक शिकायत पहुंचाना आसान है?
क्या पीड़िताओं को समय पर न्याय मिल रहा है?
और सबसे बड़ा सवाल—अपराध होने से पहले उसे रोकने की व्यवस्था कितनी मजबूत है?
इन सवालों के जवाब केवल कानून बनाने से नहीं मिल सकते। इसके लिए पुलिसिंग, न्यायिक प्रक्रिया, सामाजिक सोच और पीड़ितों के लिए सहायता व्यवस्था को भी मजबूत करना जरूरी है।
14 साल में 37 बड़ी वारदातों का जिक्र
निर्भया कांड के बाद से अब तक देश में महिलाओं के खिलाफ अपराध की कई चर्चित घटनाएं सामने आई हैं। अलग-अलग मामलों की परिस्थितियां और कानूनी स्थिति अलग रही है, लेकिन इन घटनाओं ने महिला सुरक्षा पर राष्ट्रीय स्तर पर बहस जरूर पैदा की।
इन मामलों में रेप, गैंगरेप, यौन उत्पीड़न और महिलाओं के खिलाफ हिंसा की घटनाएं शामिल रही हैं। कुछ मामलों में पुलिस की कार्रवाई पर सवाल उठे, तो कुछ में अदालतों के फैसले और जांच प्रक्रिया चर्चा में रही।
इन 37 बड़ी वारदातों को एक साथ देखने पर यह समझने की कोशिश की जा सकती है कि पिछले वर्षों में महिला सुरक्षा से जुड़ी चुनौतियां किस तरह सामने आती रही हैं।
दिल्ली से लेकर देश के अलग-अलग शहरों तक मामले
महिलाओं के खिलाफ अपराध किसी एक शहर या राज्य तक सीमित नहीं हैं। देश के अलग-अलग राज्यों और शहरों से समय-समय पर ऐसी घटनाएं सामने आती रही हैं।
बड़े शहरों में सार्वजनिक परिवहन, सड़क, मॉल, ऑफिस और अन्य सार्वजनिक स्थानों पर सुरक्षा को लेकर सवाल उठते हैं। वहीं ग्रामीण और छोटे शहरों में भी महिलाओं और बच्चियों के खिलाफ अपराध के मामले चिंता का विषय रहे हैं।
इसका मतलब यह है कि महिला सुरक्षा की चुनौती केवल पुलिस व्यवस्था तक सीमित नहीं है। यह सामाजिक और प्रशासनिक दोनों स्तरों पर एक बड़ी चुनौती है।
नोएडा कांड ने फिर बढ़ाई चिंता
2026 में सामने आया नोएडा से जुड़ा मामला भी महिला सुरक्षा को लेकर बहस का हिस्सा बन गया है। इस घटना ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा किया कि आधुनिक शहरों और तेजी से विकसित हो रहे शहरी क्षेत्रों में महिलाओं की सुरक्षा के लिए व्यवस्था कितनी प्रभावी है।
नोएडा और आसपास के क्षेत्र में बड़ी संख्या में लोग रोजगार और शिक्षा के लिए रहते हैं। ऐसे में सार्वजनिक स्थानों, परिवहन और सुनसान इलाकों में सुरक्षा व्यवस्था महत्वपूर्ण हो जाती है।
किसी भी आपराधिक घटना के बाद केवल आरोपी की गिरफ्तारी ही पर्याप्त नहीं मानी जा सकती। यह भी देखना जरूरी होता है कि घटना किन परिस्थितियों में हुई और भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए क्या कदम उठाए जा सकते हैं।



