मांगरोल नगर के कुंज चौक पर आयोजित ढाई कड़ी की रामलीला में बाली और सुग्रीव के महायुद्ध ने दर्शकों के रोमांच को चरम पर पहुंचा दिया। मंचित इस दृश्य में मयदानव नाम का दानव बाली को ललकारता है और पर्वत की ओर भाग जाता है। बाली अपने मित्र सुग्रीव से कहता है कि "मैं ना आउंतो जान लेना कि मैं मर गया।" इसके पश्चात सुग्रीव वहाँ एक माह तक प्रतीक्षा करता और समझता है कि मयदानव ने बाली को मार डाला, अब उसकी भी बारी है।
युद्ध की शुरुआत में बाली सुग्रीव पर हमला करता और पत्नी को छीन लेता है। इसके बाद दोनों के बीच भयंकर युद्ध हुआ, जिसमें अंततः बाली मारा गया। रामजी ने बाली के अकारण मारने पर व्याख्या की कि जो अत्याचार करता है या किसी की पत्नी पर बुरी दृष्टि रखता है, उसे मारने में कोई पाप नहीं होता।
रामलीला में इस महायुद्ध के अलावा बाली-सुग्रीव संवाद, बाली तारा खेल और बाली वध की लीलाओं का सजीव मंचन किया गया। मंचन के दौरान हनुमानजी, राम-लक्ष्मण, सुंदव झांकी की सजावट और झांकियों के माध्यम से दर्शकों को पूरी कथा का भव्य अनुभव कराया गया।
मुख्य अतिथियों में सार्वजानिक निर्माण विभाग के सहायक अभियंता अंकुर गुप्ता और कनिष्ट अभियंता संजीव सैनी के साथ नगर के कपड़ा व्यापारी मदनमोहन गुप्ता उपस्थित रहे। उनका स्वागत श्रीरामलीला समिति द्वारा माला पहनाकर और श्रीराम जी की तस्वीर भेंट कर किया गया। इसके पश्चात भगवरन बालाजी महाराज की सुंदर झांकी के साथ आरती की गई।
इस रामलीला कार्यक्रम में उपस्थित दर्शक देर रात तक युद्ध, संवाद और भगवान राम का मिलन देखने के लिए स्थिर रहे। पूरे आयोजन ने धार्मिक आस्था, सांस्कृतिक परंपराओं और सामाजिक एकता का अद्भुत संगम प्रस्तुत किया। दर्शकों ने मंचन की प्रत्येक झांकी और युद्ध दृश्य का हर्षोल्लास के साथ आनंद लिया, जिससे यह आयोजन मांगरोल नगर की प्रमुख सांस्कृतिक परंपरा बन गया।
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