त्याग, साहस और ममता की अद्भुत मिसाल बनी मां कंचन बाई को शुक्रवार को रानीवाड़ा स्थित अंग्रेजी माध्यम विद्यालय न्यू गोल्डन एजुकेशन सेंटर में अश्रुपूरित श्रद्धांजलि अर्पित की गई। पूरा विद्यालय परिसर भावनाओं से भर उठा, जहां शिक्षक, विद्यार्थी और प्रबंधन ने नम आंखों से उस मां को नमन किया, जिसने मासूम जिंदगियों की रक्षा के लिए अपने प्राणों का बलिदान दे दिया। यह श्रद्धांजलि सभा केवल एक औपचारिक कार्यक्रम नहीं थी, बल्कि मानवता, मातृत्व और निस्वार्थ सेवा को समर्पित एक भावनात्मक क्षण बन गई।
मधुमक्खी हमले में बच्चों को बचाते हुए दिया प्राणों का बलिदान
कुछ दिन पूर्व विद्यालय परिसर में अचानक मधुमक्खियों के हमले से अफरा-तफरी मच गई थी। उस भयावह स्थिति में जहां हर कोई जान बचाने की कोशिश कर रहा था, वहीं मां कंचन बाई ने बिना एक पल गंवाए लगभग 20 मासूम बच्चों को सुरक्षित स्थान तक पहुंचाया। बच्चों को बचाते-बचाते उन्होंने स्वयं को खतरे में डाल दिया और अंततः वीरगति को प्राप्त हुईं। उनका यह त्याग केवल एक घटना नहीं, बल्कि समाज के लिए एक अमिट संदेश बन गया—कि आज भी मां की ममता सबसे बड़ा कवच है।
त्याग और ममता की अमर प्रतिमूर्ति बनीं कंचन बाई
मां कंचन बाई श्रद्धांजलि सभा में वक्ताओं ने कहा कि कंचन बाई साधारण जीवन जीने वाली असाधारण महिला थीं। उन्होंने यह साबित कर दिया कि सच्चा साहस पद या पहचान का मोहताज नहीं होता, बल्कि संवेदनशील हृदय से जन्म लेता है। उनका बलिदान आने वाली पीढ़ियों को यह सिखाता रहेगा कि मानवता और करुणा ही समाज की असली ताकत है।
दो मिनट का मौन, पुष्पांजलि और गहरी संवेदना
श्रद्धांजलि सभा में विद्यालय निदेशक मंजीराम चौधरी, प्रधानाचार्य जयंतीलाल घांची, समस्त शिक्षकगण, कर्मचारी एवं विद्यार्थी उपस्थित रहे। सभी ने कंचन बाई की तस्वीर पर पुष्प अर्पित किए और दो मिनट का मौन रखकर उन्हें श्रद्धांजलि दी। उस क्षण पूरे विद्यालय में ऐसा सन्नाटा छा गया, मानो हर दिल मां कंचन बाई की कुर्बानी को महसूस कर रहा हो।
“केवल मां ही ऐसा कर सकती है” – विद्यालय निदेशक
विद्यालय निदेशक मंजीराम चौधरी ने भावुक शब्दों में कहा— “कंचन बाई का त्याग शब्दों से परे है। अपने प्राणों की आहुति देकर बच्चों की जान बचाना केवल एक मां ही कर सकती है। उनका बलिदान सदैव अमर रहेगा और मानवता की मिसाल बनकर जीवित रहेगा।”
“कर्मों से अमर होती हैं ऐसी पुण्य आत्माएं” – प्रधानाचार्य
प्रधानाचार्य जयंतीलाल घांची ने कहा— “कंचन बाई ममता की साक्षात देवी थीं। ऐसी पुण्य आत्माएं कभी नहीं मरतीं, वे अपने कर्मों से अमर हो जाती हैं। उनका जीवन समाज के लिए प्रेरणा का दीपक है।”
कविता ने रुला दिया पूरा परिसर
विद्यालय के स्टाफ सदस्य एवं कवि परीक्षित पाण्डेय ने अपनी स्वरचित कविता— “शत-शत नमन तुम्हें करते हैं, धन्य हो कंचन बाई…” का पाठ किया। कविता की प्रत्येक पंक्ति में त्याग और संवेदना झलक रही थी। कविता सुनते ही वातावरण भावुक हो गया और कई लोगों की आंखें छलक उठीं।




