श्रीगंगानगर-हनुमानगढ़ के सांसद कुलदीप इंदौरा ने लोकसभा में शून्यकाल के दौरान वन भूमि पर बसे लोगों के नियमितीकरण का अहम मुद्दा उठाते हुए केंद्र सरकार की नीतियों पर सवाल खड़े किए।
सांसद इंदौरा ने कहा कि देशभर में, विशेष रूप से राजस्थान में, बड़ी संख्या में लोग वर्षों से वन भूमि, जोहड़ पायतन और नर्सरी क्षेत्रों में निवास कर रहे हैं, लेकिन अब तक उनका नियमितीकरण नहीं किया गया है। उन्होंने बताया कि इन लोगों को न तो भूमि के पट्टे दिए जा रहे हैं और न ही वे सरकारी योजनाओं का लाभ उठा पा रहे हैं।
उन्होंने स्पष्ट किया कि इसमें वहां बसे लोगों की कोई गलती नहीं है, क्योंकि जब ये लोग वहां बसे थे, तब प्रशासन और संबंधित विभागों को समय रहते उचित कार्रवाई करनी चाहिए थी, जो नहीं की गई।
इंदौरा ने कहा कि वर्तमान स्थिति में उन्हीं क्षेत्रों में सरकार द्वारा स्कूल, स्वास्थ्य सेवाएं और अन्य बुनियादी सुविधाएं विकसित की जा चुकी हैं, लेकिन वहां रहने वाले गरीब लोगों को उनके अधिकार देने में लगातार देरी हो रही है। उन्होंने इसे सरकार की नीतियों में विरोधाभास बताया।
वन भूमि के उपयोग को लेकर भी सांसद ने सरकार की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि कई स्थानों पर जिसे वन भूमि घोषित किया गया है, वहां न तो पेड़-पौधे हैं और न ही कोई वास्तविक वन क्षेत्र विकसित किया गया है।
अपने संसदीय क्षेत्र का उदाहरण देते हुए उन्होंने बताया कि हनुमानगढ़ जिले के रावतसर क्षेत्र के गांव 10 DWD में लगभग 12.525 बीघा भूमि पर लोग बसे हुए हैं, जबकि उसके सामने उतनी ही भूमि वर्षों से खाली पड़ी है, जिसे कागजों में वन भूमि या नर्सरी के रूप में दर्ज किया गया है, लेकिन उसका कोई उपयोग नहीं हो रहा।
उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार और प्रशासन बसे हुए लोगों को हटाने की बात करते हैं, लेकिन खाली और अनुपयोगी वन भूमि के बेहतर उपयोग के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाए जाते। उन्होंने यह भी कहा कि हनुमानगढ़ के कोहला फार्म जैसे लगभग 10,000 बीघा क्षेत्र आज भी बंजर पड़े हैं, जिनका उपयोग आवारा पशुओं के संरक्षण, चिकित्सा सुविधा और जल प्रबंधन के लिए किया जा सकता है।
सांसद कुलदीप इंदौरा ने मांग की कि सरकार राष्ट्रीय स्तर पर सर्वे कर वन भूमि पर बसे लोगों का नियमितीकरण करे, उन्हें उनके अधिकार प्रदान करे और उपलब्ध सरकारी भूमि का वैज्ञानिक व व्यवस्थित उपयोग सुनिश्चित करे।




