ज्वालाजी मंदिर का रहस्य: बिना तेल और बाती के सदियों से जल रही अखंड ज्योति
हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले में स्थित ज्वालाजी मंदिर भारत के प्रमुख शक्तिपीठों में से एक माना जाता है। इस मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यहां चट्टानों की दरारों से निकलने वाली प्राकृतिक ज्वालाएं हैं, जो बिना तेल और बाती के लगातार जलती रहती हैं। यही कारण है कि यह मंदिर सदियों से श्रद्धालुओं, पर्यटकों और वैज्ञानिकों के आकर्षण का केंद्र बना हुआ है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, माता सती की जीभ इसी स्थान पर गिरी थी, जिसके कारण यहां किसी मूर्ति की नहीं बल्कि धरती से निकलने वाली ज्वालाओं की पूजा की जाती है। मंदिर परिसर में कई प्राकृतिक ज्वालाएं लगातार प्रज्वलित रहती हैं, जिन्हें मां ज्वाला के विभिन्न स्वरूपों का प्रतीक माना जाता है। नवरात्रि सहित पूरे वर्ष यहां देश-विदेश से बड़ी संख्या में श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं।
वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो इन ज्वालाओं के पीछे धरती के भीतर मौजूद ज्वलनशील प्राकृतिक गैसों, विशेष रूप से मीथेन जैसी गैसों के रिसाव की संभावना जताई जाती है। वैज्ञानिकों का मानना है कि सतह पर निकलने वाली ये गैसें आग के संपर्क में आने के बाद लगातार जलती रहती हैं। हालांकि, इन ज्वालाओं की उत्पत्ति और सदियों से इनके लगातार जलने को लेकर अब भी सभी वैज्ञानिक एकमत नहीं हैं, इसलिए यह स्थान आज भी शोध का विषय बना हुआ है।
इतिहासकारों के अनुसार, ज्वालाजी मंदिर का उल्लेख कई प्राचीन ग्रंथों और ऐतिहासिक विवरणों में मिलता है। लोक मान्यताओं में यह भी कहा जाता है कि मुगल सम्राट अकबर ने इन ज्वालाओं को बुझाने का प्रयास कराया था, लेकिन वे सफल नहीं हुए। बाद में उन्होंने श्रद्धा स्वरूप मंदिर में सोने का छत्र अर्पित किया। हालांकि इस घटना के कुछ हिस्से ऐतिहासिक प्रमाणों के बजाय लोक परंपराओं पर आधारित माने जाते हैं।




