श्री कर्ण नरेंद्र कृषि विश्वविद्यालय, जोबनेर जयपुर के अधीनस्थ निदेशालय अनुसंधान द्वारा आयोजित दो दिवसीय विचार-मंथन कार्यशाला “कृषि में बौद्धिक संपदा अधिकार” का गुरुवार को सफल समापन हुआ। 06-07 मई 2026 को आयोजित इस कार्यशाला में विभिन्न संस्थानों के अधिष्ठाता, निदेशक, विभागाध्यक्ष, कृषि वैज्ञानिक, विशेषज्ञ, नीति-निर्माता, उद्यमी, एफपीओ प्रतिनिधि एवं किसानों ने भाग लेकर कृषि नवाचारों के संरक्षण एवं प्रबंधन पर गहन चर्चा की।
विश्वविद्यालय के सम्मेलन सभागार में आयोजित समापन सत्र को संबोधित करते हुए कुलगुरु प्रोफेसर डॉ. पुष्पेंद्र सिंह चौहान ने कहा कि आधुनिक कृषि में अनुसंधान, नवाचार एवं तकनीकों को आईपीआर से जोड़ना समय की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि नई तकनीकों, उन्नत किस्मों एवं पारंपरिक ज्ञान का संरक्षण किसानों की आर्थिक उन्नति और आत्मनिर्भरता सुनिश्चित करेगा।
एग्रीनोवेट इंडिया लिमिटेड, नई दिल्ली के मुख्य कार्यकारी अधिकारी डॉ. प्रवीण मलिक ने कहा कि कृषि अनुसंधान को उद्योगों, स्टार्टअप और निजी क्षेत्र से जोड़कर नवाचारों को व्यावहारिक रूप दिया जा सकता है। उन्होंने सार्वजनिक-निजी सहभागिता मॉडल को कृषि विकास के लिए उपयोगी बताया।
पूर्व रजिस्ट्रार, पीपीवी एवं एफआरए, नई दिल्ली डॉ. रवि प्रकाश ने किसानों के अधिकारों की सुरक्षा और स्वदेशी जैव संसाधनों को जैव चोरी से बचाने पर जोर दिया। वहीं आईपी विशेषज्ञ आशीष राय और प्रज्ञा ठाकुर ने पेटेंट एवं ट्रेडमार्क पंजीकरण की प्रक्रिया को सरल भाषा में समझाते हुए वैज्ञानिकों और नवाचारकर्ताओं को आईपीआर संरक्षण के प्रति जागरूक किया।
निदेशक अनुसंधान डॉ. उम्मेद सिंह ने कहा कि कार्यशाला से प्राप्त सुझाव और कार्ययोजना कृषि अनुसंधान एवं नवाचारों को नई दिशा प्रदान करेंगे। उन्होंने बताया कि बौद्धिक संपदा संरक्षण की जानकारी मिलने से वैज्ञानिक अपने अनुसंधान को अधिकाधिक पंजीकृत करवा सकेंगे, जिससे विश्वविद्यालय और किसानों दोनों को लाभ मिलेगा।
कार्यशाला के विभिन्न तकनीकी सत्रों में पेटेंट, ट्रेडमार्क, कॉपीराइट, डिजाइन, बीज उत्पादन, किसानों के अधिकार, जीआई टैग, जैव संसाधनों के संरक्षण एवं कृषि तकनीकों के व्यावसायीकरण जैसे विषयों पर विशेषज्ञों ने विस्तार से जानकारी दी।
दूसरे दिन आयोजित तकनीकी सत्र में कृषि उत्पादों के लिए जीआई टैगिंग एवं आईपीआर प्रबंधन पर विशेष चर्चा हुई। राजस्थान सरकार के जीआई टैग सलाहकार डॉ. विकास पावडिया ने कहा कि जीआई टैग से स्थानीय कृषि उत्पादों को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पहचान मिलने के साथ किसानों की आय में वृद्धि संभव है।
कार्यशाला के अंतिम चरण में आयोजित पैनल चर्चा में कृषि विश्वविद्यालयों में आईपीआर प्रकोष्ठ मजबूत बनाने, किसानों एवं युवा उद्यमियों के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित करने तथा कृषि तकनीकों की पेटेंट एवं लाइसेंसिंग प्रक्रिया सरल बनाने जैसी महत्वपूर्ण अनुशंसाएं प्रस्तुत की गईं।




