शिक्षा सुधार के लिए बनीं सात प्रमुख समितियां
भारत को आजादी मिलने के बाद शिक्षा व्यवस्था को आधुनिक और प्रभावी बनाने के लिए समय-समय पर कई समितियों और आयोगों का गठन किया गया। इन समितियों का उद्देश्य देश की बदलती जरूरतों के अनुसार शिक्षा प्रणाली में सुधार करना, नई नीतियां तैयार करना और छात्रों को बेहतर शिक्षा उपलब्ध कराना था।
हाल के दिनों में शिक्षा सुधार को लेकर नई चर्चाओं के बीच यह सवाल फिर सामने आया कि क्या शिक्षा सुधार की शुरुआत पहली बार हुई है। वास्तव में, स्वतंत्रता के बाद से अब तक कई महत्वपूर्ण समितियां शिक्षा व्यवस्था में बदलाव की दिशा तय कर चुकी हैं।
डॉ. राधाकृष्णन आयोग (1948-49)
आजादी के बाद गठित पहला बड़ा आयोग डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन आयोग था। इस आयोग का मुख्य फोकस उच्च शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार और विश्वविद्यालयों को अधिक स्वायत्त बनाने पर था।
इसकी सिफारिशों के आधार पर विश्वविद्यालय शिक्षा में कई महत्वपूर्ण बदलाव किए गए।
मुदालियर आयोग (1952-53)
मुदालियर आयोग का गठन माध्यमिक शिक्षा में सुधार के उद्देश्य से किया गया था। इस आयोग ने पाठ्यक्रम को व्यावहारिक बनाने, तकनीकी शिक्षा को बढ़ावा देने और छात्रों के सर्वांगीण विकास पर जोर दिया।
कोठारी आयोग (1964-66)
भारत की शिक्षा व्यवस्था में सबसे प्रभावशाली आयोगों में कोठारी आयोग का नाम प्रमुखता से लिया जाता है। इस आयोग ने शिक्षा को राष्ट्रीय विकास का आधार बताया और समान शिक्षा व्यवस्था की वकालत की।
इसी आयोग की कई सिफारिशों के आधार पर 1968 की पहली राष्ट्रीय शिक्षा नीति बनाई गई।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1968
कोठारी आयोग की सिफारिशों के बाद देश की पहली राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP 1968) लागू की गई। इसमें समान अवसर, विज्ञान शिक्षा और राष्ट्रीय एकता पर विशेष जोर दिया गया।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986
1986 में नई शिक्षा नीति लागू की गई, जिसमें महिला शिक्षा, वयस्क शिक्षा, तकनीकी शिक्षा और पिछड़े वर्गों तक शिक्षा पहुंचाने पर विशेष ध्यान दिया गया।
बाद में इसमें 1992 में कुछ संशोधन भी किए गए।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020
नई शिक्षा नीति 2020 को भारतीय शिक्षा प्रणाली में सबसे बड़े सुधारों में माना जाता है। इसमें 5+3+3+4 शिक्षा संरचना, मातृभाषा में शिक्षा, कौशल विकास, डिजिटल शिक्षा और बहुविषयक अध्ययन पर विशेष जोर दिया गया।




