जहां आज बर्फीली चोटियां हैं, वहां कभी समुद्र लहराता था
हिमालय को आज दुनिया की सबसे विशाल और खूबसूरत पर्वत श्रृंखलाओं में गिना जाता है, लेकिन इसकी कहानी बेहद रोचक है। करोड़ों वर्ष पहले जिस क्षेत्र में आज हिमालय की ऊंची चोटियां दिखाई देती हैं, वहां टेथिस सागर फैला हुआ था। भूगर्भीय बदलावों और भारतीय प्लेट के यूरेशियन प्लेट से टकराने की प्रक्रिया ने इस पूरे क्षेत्र का स्वरूप बदल दिया।
भारतीय प्लेट लगातार उत्तर दिशा की ओर बढ़ती हुई यूरेशियन प्लेट से टकराई। इस टकराव के कारण समुद्र की तलहटी में जमा चट्टानें, अवसाद और अन्य भूगर्भीय पदार्थ ऊपर उठने लगे। लाखों वर्षों तक चली इस प्रक्रिया ने हिमालय को जन्म दिया। यही वजह है कि हिमालय को भूगर्भीय दृष्टि से अपेक्षाकृत युवा और सक्रिय पर्वत श्रृंखला माना जाता है।
हिमालय आज भी ऊपर उठ रहा है
हिमालय के निर्माण की प्रक्रिया पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। भारतीय और यूरेशियन प्लेटों के बीच आज भी दबाव और भूगर्भीय गतिविधियां जारी हैं। यही कारण है कि हिमालयी क्षेत्र में पर्वतों के उठने की प्रक्रिया अभी भी जारी मानी जाती है।
वैज्ञानिक अध्ययनों में हिमालय के कुछ हिस्सों के हर वर्ष कुछ मिलीमीटर तक ऊंचा होने की जानकारी सामने आती रही है। यानी जिस पर्वत श्रृंखला को हम स्थिर और विशाल मानते हैं, वह भूगर्भीय पैमाने पर आज भी बदलाव के दौर से गुजर रही है।
हालांकि यह बदलाव इंसानी जीवन की समय-सीमा में बहुत धीमा दिखाई देता है, लेकिन यही सक्रिय भूगर्भीय स्थिति हिमालय को भूकंप के लिहाज से भी संवेदनशील बनाती है।
क्यों बनता जा रहा है ज्यादा संवेदनशील?
हिमालय की प्राकृतिक बनावट बेहद जटिल है। यहां ऊंचे पहाड़, खड़ी ढलानें, ग्लेशियर, बर्फीली चोटियां और संकरी घाटियां मौजूद हैं। इसके साथ ही यह क्षेत्र मानसून के दौरान भारी बारिश का सामना करता है।
जब भारी बारिश, कमजोर पहाड़ी ढलानों और भूगर्भीय गतिविधियों का असर एक साथ दिखाई देता है, तो भूस्खलन, अचानक बाढ़ और सड़क धंसने जैसी घटनाओं का खतरा बढ़ जाता है।
कई हिमालयी क्षेत्रों में सड़क निर्माण, सुरंग, जलविद्युत परियोजनाओं और पर्यटन से जुड़ी गतिविधियां भी तेजी से बढ़ी हैं। विशेषज्ञों के अनुसार संवेदनशील पहाड़ी इलाकों में यदि निर्माण प्राकृतिक परिस्थितियों को ध्यान में रखकर नहीं किया जाए तो आपदा का प्रभाव और गंभीर हो सकता है।
ग्लेशियरों का पिघलना सबसे बड़ी चिंता
हिमालय को एशिया का महत्वपूर्ण जल भंडार माना जाता है। यहां मौजूद ग्लेशियर और बर्फीले क्षेत्र कई बड़ी नदियों के जल स्रोतों में योगदान करते हैं। इन नदियों पर भारत समेत कई देशों की बड़ी आबादी की कृषि, पेयजल और अन्य जरूरतें निर्भर हैं।
लेकिन बढ़ते वैश्विक तापमान के बीच हिमालयी ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने को लेकर चिंता बढ़ रही है। ग्लेशियरों के पीछे हटने से केवल बर्फ का क्षेत्र कम नहीं होता, बल्कि इससे पहाड़ों में मौजूद झीलों और जल प्रणालियों पर भी असर पड़ सकता है।
विशेष रूप से Glacial Lake Outburst Flood यानी GLOF का खतरा महत्वपूर्ण है। ग्लेशियरों के पिघलने से बनी झीलों में अचानक पानी बढ़ने या प्राकृतिक बांध टूटने पर नीचे के इलाकों में तेज रफ्तार से पानी पहुंच सकता है।
भारी बारिश और अचानक आने वाली बाढ़ का खतरा
हिमालयी क्षेत्रों में बारिश सामान्य रूप से भी चुनौतीपूर्ण होती है, लेकिन जब कम समय में बहुत अधिक बारिश होती है तो हालात तेजी से बिगड़ सकते हैं।
पहाड़ी इलाकों में पानी के तेज बहाव के कारण नदियों और नालों का जलस्तर अचानक बढ़ सकता है। कई बार मलबा, पत्थर और मिट्टी भी पानी के साथ नीचे की ओर बहती है। इसे फ्लैश फ्लड यानी अचानक आने वाली बाढ़ के रूप में देखा जाता है।
ऐसी घटनाओं में सड़कें, पुल, मकान और अन्य बुनियादी ढांचा प्रभावित हो सकता है। पहाड़ी क्षेत्रों में राहत और बचाव अभियान भी मैदानी इलाकों की तुलना में अधिक चुनौतीपूर्ण होता है।
भूस्खलन बढ़ा सकता है मुश्किल
हिमालयी क्षेत्र में भूस्खलन कोई नई घटना नहीं है, लेकिन भारी बारिश और मानवीय गतिविधियों के कारण इसकी गंभीरता बढ़ सकती है।
पहाड़ों में सड़क चौड़ी करने, कटिंग करने और निर्माण कार्यों के दौरान प्राकृतिक ढलानों में बदलाव किया जाता है। यदि जल निकासी की उचित व्यवस्था नहीं हो तो बारिश का पानी मिट्टी और चट्टानों को कमजोर कर सकता है।



