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कभी समुद्र था हिमालय, आज दुनिया की छत; आखिर क्यों बढ़ रहा खतरा?

हिमालय दुनिया की सबसे युवा पर्वत श्रृंखलाओं में है, जो आज भी ऊंचा हो रहा है। ग्लेशियर पिघलने और जलवायु परिवर्तन से खतरे बढ़ रहे हैं।

enews bharat7 September 2026
कभी समुद्र था हिमालय, आज दुनिया की छत; आखिर क्यों बढ़ रहा खतरा?

जहां आज बर्फीली चोटियां हैं, वहां कभी समुद्र लहराता था

हिमालय को आज दुनिया की सबसे विशाल और खूबसूरत पर्वत श्रृंखलाओं में गिना जाता है, लेकिन इसकी कहानी बेहद रोचक है। करोड़ों वर्ष पहले जिस क्षेत्र में आज हिमालय की ऊंची चोटियां दिखाई देती हैं, वहां टेथिस सागर फैला हुआ था। भूगर्भीय बदलावों और भारतीय प्लेट के यूरेशियन प्लेट से टकराने की प्रक्रिया ने इस पूरे क्षेत्र का स्वरूप बदल दिया।

भारतीय प्लेट लगातार उत्तर दिशा की ओर बढ़ती हुई यूरेशियन प्लेट से टकराई। इस टकराव के कारण समुद्र की तलहटी में जमा चट्टानें, अवसाद और अन्य भूगर्भीय पदार्थ ऊपर उठने लगे। लाखों वर्षों तक चली इस प्रक्रिया ने हिमालय को जन्म दिया। यही वजह है कि हिमालय को भूगर्भीय दृष्टि से अपेक्षाकृत युवा और सक्रिय पर्वत श्रृंखला माना जाता है।

हिमालय आज भी ऊपर उठ रहा है

हिमालय के निर्माण की प्रक्रिया पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। भारतीय और यूरेशियन प्लेटों के बीच आज भी दबाव और भूगर्भीय गतिविधियां जारी हैं। यही कारण है कि हिमालयी क्षेत्र में पर्वतों के उठने की प्रक्रिया अभी भी जारी मानी जाती है।

वैज्ञानिक अध्ययनों में हिमालय के कुछ हिस्सों के हर वर्ष कुछ मिलीमीटर तक ऊंचा होने की जानकारी सामने आती रही है। यानी जिस पर्वत श्रृंखला को हम स्थिर और विशाल मानते हैं, वह भूगर्भीय पैमाने पर आज भी बदलाव के दौर से गुजर रही है।

हालांकि यह बदलाव इंसानी जीवन की समय-सीमा में बहुत धीमा दिखाई देता है, लेकिन यही सक्रिय भूगर्भीय स्थिति हिमालय को भूकंप के लिहाज से भी संवेदनशील बनाती है।

क्यों बनता जा रहा है ज्यादा संवेदनशील?

हिमालय की प्राकृतिक बनावट बेहद जटिल है। यहां ऊंचे पहाड़, खड़ी ढलानें, ग्लेशियर, बर्फीली चोटियां और संकरी घाटियां मौजूद हैं। इसके साथ ही यह क्षेत्र मानसून के दौरान भारी बारिश का सामना करता है।

जब भारी बारिश, कमजोर पहाड़ी ढलानों और भूगर्भीय गतिविधियों का असर एक साथ दिखाई देता है, तो भूस्खलन, अचानक बाढ़ और सड़क धंसने जैसी घटनाओं का खतरा बढ़ जाता है।

कई हिमालयी क्षेत्रों में सड़क निर्माण, सुरंग, जलविद्युत परियोजनाओं और पर्यटन से जुड़ी गतिविधियां भी तेजी से बढ़ी हैं। विशेषज्ञों के अनुसार संवेदनशील पहाड़ी इलाकों में यदि निर्माण प्राकृतिक परिस्थितियों को ध्यान में रखकर नहीं किया जाए तो आपदा का प्रभाव और गंभीर हो सकता है।

ग्लेशियरों का पिघलना सबसे बड़ी चिंता

हिमालय को एशिया का महत्वपूर्ण जल भंडार माना जाता है। यहां मौजूद ग्लेशियर और बर्फीले क्षेत्र कई बड़ी नदियों के जल स्रोतों में योगदान करते हैं। इन नदियों पर भारत समेत कई देशों की बड़ी आबादी की कृषि, पेयजल और अन्य जरूरतें निर्भर हैं।

लेकिन बढ़ते वैश्विक तापमान के बीच हिमालयी ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने को लेकर चिंता बढ़ रही है। ग्लेशियरों के पीछे हटने से केवल बर्फ का क्षेत्र कम नहीं होता, बल्कि इससे पहाड़ों में मौजूद झीलों और जल प्रणालियों पर भी असर पड़ सकता है।

विशेष रूप से Glacial Lake Outburst Flood यानी GLOF का खतरा महत्वपूर्ण है। ग्लेशियरों के पिघलने से बनी झीलों में अचानक पानी बढ़ने या प्राकृतिक बांध टूटने पर नीचे के इलाकों में तेज रफ्तार से पानी पहुंच सकता है।

भारी बारिश और अचानक आने वाली बाढ़ का खतरा

हिमालयी क्षेत्रों में बारिश सामान्य रूप से भी चुनौतीपूर्ण होती है, लेकिन जब कम समय में बहुत अधिक बारिश होती है तो हालात तेजी से बिगड़ सकते हैं।

पहाड़ी इलाकों में पानी के तेज बहाव के कारण नदियों और नालों का जलस्तर अचानक बढ़ सकता है। कई बार मलबा, पत्थर और मिट्टी भी पानी के साथ नीचे की ओर बहती है। इसे फ्लैश फ्लड यानी अचानक आने वाली बाढ़ के रूप में देखा जाता है।

ऐसी घटनाओं में सड़कें, पुल, मकान और अन्य बुनियादी ढांचा प्रभावित हो सकता है। पहाड़ी क्षेत्रों में राहत और बचाव अभियान भी मैदानी इलाकों की तुलना में अधिक चुनौतीपूर्ण होता है।

भूस्खलन बढ़ा सकता है मुश्किल

हिमालयी क्षेत्र में भूस्खलन कोई नई घटना नहीं है, लेकिन भारी बारिश और मानवीय गतिविधियों के कारण इसकी गंभीरता बढ़ सकती है।

पहाड़ों में सड़क चौड़ी करने, कटिंग करने और निर्माण कार्यों के दौरान प्राकृतिक ढलानों में बदलाव किया जाता है। यदि जल निकासी की उचित व्यवस्था नहीं हो तो बारिश का पानी मिट्टी और चट्टानों को कमजोर कर सकता है।

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इसके बाद बड़े पैमाने पर मिट्टी और चट्टानों के खिसकने से भूस्खलन हो सकता है। कई बार इससे सड़क संपर्क पूरी तरह टूट जाता है और दूरदराज के गांवों का संपर्क भी प्रभावित हो जाता है।

केदारनाथ से लेकर नेपाल तक सामने आ चुकी हैं चेतावनियां

हिमालयी क्षेत्र में सामने आई कई बड़ी प्राकृतिक आपदाओं ने इस पर्वत श्रृंखला की संवेदनशीलता को उजागर किया है। केदारनाथ आपदा ने देश को भारी बारिश, अचानक बाढ़ और पहाड़ी क्षेत्रों में बढ़ते जोखिम की गंभीरता का एहसास कराया था।

नेपाल और हिमालय से जुड़े अन्य क्षेत्रों में भी समय-समय पर बाढ़, भूस्खलन और ग्लेशियर से संबंधित घटनाएं सामने आती रही हैं।

इन घटनाओं से यह सवाल लगातार उठता रहा है कि क्या हिमालय जैसे संवेदनशील क्षेत्र में विकास परियोजनाओं की योजना बनाते समय प्राकृतिक जोखिमों का पर्याप्त आकलन किया जा रहा है?

विकास जरूरी, लेकिन प्रकृति की कीमत पर नहीं

हिमालयी राज्यों और क्षेत्रों में सड़क, पर्यटन, बिजली और रोजगार के लिए विकास जरूरी है। स्थानीय लोगों के लिए बेहतर कनेक्टिविटी और आर्थिक अवसर भी महत्वपूर्ण हैं।

लेकिन हिमालय की भौगोलिक संवेदनशीलता को देखते हुए विकास की रणनीति मैदानी इलाकों से अलग होनी चाहिए। पहाड़ों पर किसी भी बड़े निर्माण से पहले भूगर्भीय स्थिति, जल निकासी, भूस्खलन का खतरा और पर्यावरणीय प्रभाव का वैज्ञानिक अध्ययन जरूरी है।

विशेषज्ञों का मानना है कि संवेदनशील क्षेत्रों में कैरिंग कैपेसिटी यानी किसी इलाके की प्राकृतिक क्षमता के अनुसार विकास की सीमा तय करना महत्वपूर्ण है।

आने वाली पीढ़ियों के लिए हिमालय को बचाना चुनौती

हिमालय केवल भारत की प्राकृतिक सीमा नहीं है। यह दक्षिण एशिया की जल व्यवस्था, जैव विविधता और मौसम प्रणाली के लिए बेहद महत्वपूर्ण क्षेत्र है।

जलवायु परिवर्तन के कारण बढ़ता तापमान, ग्लेशियरों में बदलाव और मौसम की चरम घटनाएं हिमालय के भविष्य के लिए गंभीर चुनौती हैं। इसके साथ ही अनियोजित निर्माण और प्राकृतिक संसाधनों के अत्यधिक दोहन से जोखिम बढ़ सकता है।

इसलिए हिमालय को बचाने के लिए केवल आपदा आने के बाद राहत पहुंचाना पर्याप्त नहीं होगा। आपदा से पहले तैयारी, वैज्ञानिक निगरानी, ग्लेशियरों की मॉनिटरिंग, बेहतर मौसम पूर्वानुमान और पर्यावरण के अनुरूप निर्माण नीति पर जोर देना होगा।


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