12 वर्षीय एकांश अगनानी ने इंटरनेशनल कराटे चैंपियनशिप में जीता गोल्ड मेडल
कभी सेल्फ डिफेंस सीखने की एक मासूम जिद से शुरू हुआ सफर आज अंतरराष्ट्रीय मंच पर गोल्ड मेडल तक पहुंच चुका है। राजस्थान के चित्तौड़गढ़ के 12 वर्षीय एकांश अगनानी ने कोलकाता में आयोजित 10वीं इंटरनेशनल कराटे चैंपियनशिप इंडियन चैलेंजर कप-2026 में नेपाल के खिलाड़ी को हराकर स्वर्ण पदक अपने नाम किया है। कम उम्र में मिली यह उपलब्धि केवल एक जीत नहीं, बल्कि अनुशासन, धैर्य और बड़े सपनों की चमकदार मिसाल है।
एकांश की कहानी उन खेल प्रतिभाओं में शामिल है, जो यह साबित करती हैं कि बड़े मंच तक पहुंचने के लिए उम्र नहीं, संकल्प मायने रखता है। मुकाबले से पहले घबराहट होना स्वाभाविक है, लेकिन एकांश के लिए वही घबराहट हौसले में बदल जाती है, जब वह अपने कंधों पर तिरंगा ओढ़कर भारत के लिए गोल्ड जीतने का सपना याद करते हैं। यही भाव उन्हें सामान्य खिलाड़ी से अलग पहचान देता है।
पांच साल की उम्र में शुरू हुआ सपना
एकांश ने बेहद छोटी उम्र में कराटे की ओर रुख किया। जब अधिकांश बच्चे खेल को सिर्फ मनोरंजन की नजर से देखते हैं, तब उन्होंने सेल्फ डिफेंस सीखने की इच्छा जताई। उनके माता-पिता मुकेश अगनानी और याशिका अगनानी ने इस रुचि को गंभीरता से लिया और उन्हें कराटे एकेडमी में भेजा। शुरुआती कदम भले खेल-खेल में उठे हों, लेकिन धीरे-धीरे यही अभ्यास उनके व्यक्तित्व और दिनचर्या का अहम हिस्सा बन गया।
उनके कोच मोहित वैष्णव ने शुरुआती दौर में ही उनकी क्षमता पहचान ली थी। रिपोर्ट के अनुसार, एकांश नई तकनीक को तेजी से सीखते हैं और हर प्रदर्शन के साथ खुद को बेहतर साबित करते हैं। तकनीकी प्रशिक्षण के साथ उन्हें मुकाबले के दौरान शांत रहना, दबाव में संतुलन बनाए रखना और फोकस के साथ खेलना भी सिखाया गया। यही गुण आगे चलकर उनकी प्रतिस्पर्धात्मक सफलता की मजबूत नींव बने।
हार से नहीं टूटा मन, वहीं से बनी जीत की राह
हर बड़ी सफलता के पीछे एक ऐसा मोड़ होता है, जहां खिलाड़ी को खुद को परखना पड़ता है। एकांश के लिए यह मोड़ तब आया, जब उन्होंने नौ साल की उम्र में पहली बार नेशनल चैंपियनशिप खेली और कोई मेडल नहीं मिला। लेकिन यही हार उनके सफर का अंत नहीं, बल्कि नए अध्याय की शुरुआत बनी। अगले साल उन्होंने नेशनल स्तर पर ब्रॉन्ज जीता और उसके बाद गोल्ड मेडल तक पहुंचे।
रांचीमें आयोजित प्रतियोगिता में जनवरी में गोल्ड जीतने के बाद कोलकाता का यह इंटरनेशनल गोल्ड उनके करियर की अब तक की सबसे बड़ी उपलब्धि बनकर सामने आया। यह क्रम बताता है कि निरंतरता ही प्रतिभा को उपलब्धि में बदलती है। एकांश ने वही किया—हार को निराशा नहीं बनने दिया, बल्कि उसे अपने अगले लक्ष्य की सीढ़ी बना लिया।
घबराहट होती है, लेकिन तिरंगे का सपना हिम्मत देता है
एकांश का यह स्वीकार करना कि मुकाबले से पहले उन्हें घबराहट होती है, उनकी कहानी को और मानवीय बनाता है। बड़े खिलाड़ी भी दबाव महसूस करते हैं, फर्क सिर्फ इतना होता है कि वे उस दबाव को ऊर्जा में बदलना सीख लेते हैं। एकांश के लिए यह ताकत उनके भीतर बचपन से पल रहा वह सपना है, जिसमें वह भारत के लिए जीतते हुए खुद को तिरंगे के साथ देखते हैं।
यही सोच उन्हें मानसिक मजबूती देती है। उनके बयान में सिर्फ खेल नहीं, बल्कि देश के लिए कुछ कर गुजरने की भावना भी झलकती है। यही वजह है कि उनकी उपलब्धि स्थानीय खबर भर नहीं रह जाती, बल्कि एक प्रेरक राष्ट्रीय खेल कथा का रूप ले लेती है।
पढ़ाई और खेल के बीच अनुशासन का संतुलन
एकांश रोजाना 2 से 3 घंटे कराटे का अभ्यास करते हैं और पढ़ाई के लिए अलग समय निकालते हैं। यह संतुलन बताता है कि कम उम्र में भी अगर समय प्रबंधन और अनुशासन की समझ विकसित हो जाए, तो कई मोर्चों पर उत्कृष्ट प्रदर्शन संभव है। उन्होंने साफ कहा है कि नियमित मेहनत और समय का सही उपयोग ही सफलता का सबसे बड़ा मंत्र है।
आज जब बच्चों की उपलब्धियों को अक्सर सिर्फ प्रतिभा से जोड़कर देखा जाता है, तब एकांश की यात्रा यह याद दिलाती है कि प्रतिभा को चमकाने के लिए निरंतर अभ्यास, मानसिक तैयारी और परिवार का सहयोग उतना ही जरूरी होता है।




