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द्याहड़ी आठै और ऊत परंपरा से जुड़ी अनोखी लोक आस्था

नवरात्रि अष्टमी पर द्याहड़ी आठै और ऊत परंपरा परिवार को जोड़ती है, कुल परंपरा, आस्था, प्रकृति संरक्षण और सामाजिक एकता का संदेश देती है।

रमेश चंद्र शर्मा28 March 2026
द्याहड़ी आठै और ऊत परंपरा से जुड़ी अनोखी लोक आस्था

नवरात्रि के पावन अवसर पर अष्टमी तिथि को मनाई जाने वाली “द्याहड़ी आठै” भारतीय लोक परंपराओं का एक अद्भुत और गहरा प्रतीक है। इस दिन पूरा परिवार एकत्र होकर देवी पूजा करता है और अपने-अपने कुल की वंश परंपरा के अनुसार विशेष विधि से अनुष्ठान सम्पन्न करता है।

द्याहड़ी आठै में घर की दीवार पर सिंदूर से देवी का त्रिशूल बनाकर पूजा की जाती है। हर कुल की अपनी अलग परंपरा होती है—कहीं खीर और बाटी का भोग बनता है, तो कहीं विशेष नियमों के तहत तवा तक नहीं चढ़ाया जाता। यह परंपराएं पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही हैं और हर परिवार उन्हें पूरी श्रद्धा से निभाता है।

इस परंपरा का एक महत्वपूर्ण पहलू “द्याहड़ी” के रूप में किसी वनस्पति को गोद लेना भी है। जैसे किसी कुल की द्याहड़ी नीम होती है, किसी की आशापाला या दूधी। इन वृक्षों को उस कुल द्वारा संरक्षित किया जाता है और इन्हें नुकसान पहुंचाना अपशकुन माना जाता है। यह परंपरा प्रकृति संरक्षण का भी सशक्त संदेश देती है।

नववधु के लिए भी यह परंपरा बेहद महत्वपूर्ण होती है। उसे अपने ससुराल की इन रीति-रिवाजों को समझकर अपनाना होता है, जो पारिवारिक समरसता और एकता का आधार बनता है।

द्याहड़ी आठै के दिन एक विशेष नियम यह भी है कि परिवार का कोई भी सदस्य कहीं भी हो, उसे हर हाल में इस पूजा में शामिल होना अनिवार्य होता है। इससे वर्ष में कम से कम एक बार पूरा परिवार एक साथ एकत्रित होता है और आपसी संबंध मजबूत होते हैं।

इसी तरह “ऊत” परंपरा भी लोक आस्था का एक अनूठा स्वरूप है। ऊत उस व्यक्ति को माना जाता है, जिसकी कुंवारे अवस्था में अकाल मृत्यु हो गई हो। मान्यता है कि ऊत सर्प योनि में होता है और परिवार पर आने वाले संकटों से रक्षा करता है।

जब परिवार में बार-बार समस्याएं आती हैं, तब “ऊत जी का पाटा भरना” और “रातिजगा” किया जाता है। इस दौरान पूरे परिवार का उपस्थित होना अनिवार्य होता है, चाहे आपसी मतभेद ही क्यों न हों। रातभर भजन-कीर्तन होते हैं और मान्यता है कि ऊत किसी सदस्य के माध्यम से प्रकट होकर समस्याओं का समाधान बताते हैं।

इन परंपराओं का मूल उद्देश्य संयुक्त परिवार की भावना को बनाए रखना, आपसी संबंधों को मजबूत करना और वंश परंपरा को आगे बढ़ाना है।

भारतीय संस्कृति में पुत्र और पुत्री दोनों को समान महत्व दिया गया है, हालांकि वंश परंपरा को आगे बढ़ाने के लिए पुत्र की भूमिका मानी जाती है, जबकि पुत्री दूसरे कुल को आगे बढ़ाती है। सामाजिक रीति-रिवाजों में दोनों के सम्मान और सहभागिता का विशेष ध्यान रखा गया है।

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यह सभी परंपराएं हमें एकजुट रहकर, प्रकृति का सम्मान करते हुए और नैतिक मूल्यों के साथ जीवन जीने की प्रेरणा देती हैं। यही हमारी सनातन संस्कृति की खूबसूरती है, जो “जीओ और जीने दो” के सिद्धांत पर आधारित है।


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