छतरपुर जिले में नए शैक्षणिक सत्र 2026-27 की शुरुआत के साथ ही शिक्षा व्यवस्था की जमीनी हकीकत एक बार फिर सामने आ गई है। जहां एक ओर सरकार बच्चों के सर्वांगीण विकास और खेल प्रतिभाओं को निखारने के बड़े दावे करती है, वहीं दूसरी ओर जिले के हजारों छात्र बुनियादी सुविधाओं के अभाव से जूझ रहे हैं।
जिले के कुल 2240 शासकीय स्कूलों में से करीब 889 स्कूल ऐसे हैं, जहां खेल के लिए मैदान ही उपलब्ध नहीं है। यानी लगभग 40 प्रतिशत स्कूलों में बच्चों के पास खेलने के लिए कोई सुरक्षित और निर्धारित स्थान नहीं है। यह स्थिति न केवल शिक्षा व्यवस्था की कमजोरी को उजागर करती है, बल्कि बच्चों के शारीरिक और मानसिक विकास पर भी गंभीर सवाल खड़े करती है।
सबसे खराब स्थिति इन क्षेत्रों में
राजनगर और बिजावर ब्लॉक की स्थिति सबसे ज्यादा चिंताजनक बताई जा रही है। यहां कई प्राथमिक और माध्यमिक स्कूल ऐसे हैं, जहां खेल गतिविधियां केवल कागजी औपचारिकता बनकर रह गई हैं। बच्चों को खुले मैदान की बजाय संकरी गलियों, सड़कों या असुरक्षित स्थानों पर खेलना पड़ रहा है।
सुरक्षा और सुविधाओं का अभाव
स्थिति और भी गंभीर तब हो जाती है जब यह सामने आता है कि जिले के 1685 स्कूलों में बाउंड्रीवॉल तक नहीं है। इसका मतलब यह है कि जहां थोड़ी बहुत जगह है भी, वहां सुरक्षा का अभाव बना रहता है। कई स्कूलों में खुले स्थानों पर कचरा, आवारा पशु और बाहरी लोगों की आवाजाही देखी जाती है, जिससे छात्र-छात्राओं की सुरक्षा भी खतरे में रहती है।
प्रतिभा पर पड़ रहा असर
खेल विशेषज्ञों और शिक्षकों का मानना है कि खेल गतिविधियां बच्चों के शारीरिक स्वास्थ्य के साथ-साथ मानसिक विकास के लिए भी बेहद जरूरी होती हैं। लेकिन मैदानों की कमी के कारण बच्चों की प्रतिभा निखर नहीं पा रही है। ‘खेलो इंडिया’ और ‘फिट इंडिया’ जैसे अभियानों के बावजूद जमीनी स्तर पर हालात चिंताजनक बने हुए हैं।
प्रशासन का पक्ष
जिला शिक्षा अधिकारी ए.एस. पांडेय का कहना है कि बजट और संसाधनों के अनुसार सुविधाएं विकसित करने का कार्य जारी है। उन्होंने आश्वासन दिया कि भूमि आवंटन और निर्माण कार्यों के माध्यम से जल्द ही स्कूलों में खेल मैदान और अन्य जरूरी सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएंगी।




