किसी ने घर बनाने के लिए सालों तक पैसे जोड़े, किसी ने बच्चों के भविष्य के लिए जमीन बचाकर रखी और किसी ने सोचा था कि इसी घर में उसकी अगली पीढ़ी भी रहेगी। लेकिन भोजपुर के जवइनिया गांव में गंगा के कटाव ने इन सपनों को अचानक संकट में डाल दिया।
शाहपुर प्रखंड के जवइनिया गांव में गंगा की तेज धारा से लगातार जमीन कटने की स्थिति सामने आई है। रिपोर्ट के मुताबिक बड़ी संख्या में घर नदी की चपेट में आ चुके हैं और कई परिवारों के सामने सुरक्षित जगह पर जाने की चुनौती खड़ी हो गई है।
आंखों के सामने नदी में समा गए आशियाने
जिन घरों को लोगों ने अपनी जिंदगी की सबसे बड़ी जमा पूंजी लगाकर बनाया था, उन्हें अपनी आंखों के सामने टूटते और नदी में समाते देखना परिवारों के लिए बेहद मुश्किल रहा।
रिपोर्ट में एक ऐसे परिवार का भी जिक्र है, जिसने करीब 16 लाख रुपए खर्च करके 11 कमरों का घर बनाया था। कटाव के बाद यह मकान भी गंगा में चला गया और परिवार को सुरक्षित जगह की तलाश करनी पड़ी।
यह सिर्फ एक मकान का नुकसान नहीं है। घर के साथ परिवार की जमा पूंजी, घरेलू सामान, जमीन और वर्षों की यादें भी चली जाती हैं।
घर के साथ खेत भी गए
गंगा किनारे रहने वाले लोगों की जिंदगी नदी और जमीन दोनों से जुड़ी होती है। खेत से परिवार का खर्च चलता है और उसी जमीन पर घर बना होता है। ऐसे में जब कटाव शुरू होता है तो नुकसान एक जगह नहीं रुकता।
पहले खेती की जमीन नदी में जाती है और फिर धीरे-धीरे कटाव घरों तक पहुंच जाता है। जिन परिवारों की जमीन पहले ही जा चुकी है, उनके लिए घर खोना और भी बड़ी परेशानी बन जाता है।
अब कई परिवारों के सामने यह सवाल है कि वे दोबारा घर कहां बनाएंगे और रोजी-रोटी का इंतजाम कैसे करेंगे।
गांव की पहचान भी कटाव की चपेट में
रिपोर्ट के मुताबिक जवइनिया में सिर्फ घर ही प्रभावित नहीं हुए। गांव के कुछ धार्मिक स्थल, पानी की टंकी और पेड़ भी कटाव की चपेट में आए हैं।
किसी गांव के लिए मंदिर या सार्वजनिक जगह केवल एक इमारत नहीं होती। वहां लोगों की धार्मिक आस्था, सामाजिक मेल-जोल और वर्षों पुरानी यादें जुड़ी होती हैं। ऐसे स्थानों का नदी में समाना ग्रामीणों के लिए भावनात्मक नुकसान भी है।
अब सबसे बड़ा सवाल- जाएं तो जाएं कहां?
कटाव पीड़ित परिवारों के सामने सबसे बड़ी समस्या सुरक्षित पुनर्वास की है।
अगर किसी परिवार का घर नदी में चला जाए तो केवल आर्थिक मदद से समस्या पूरी तरह खत्म नहीं होती। परिवार को रहने के लिए जमीन चाहिए, घर चाहिए, बच्चों के लिए स्कूल चाहिए, पीने का पानी चाहिए और रोजी-रोटी के साधन भी चाहिए।
ग्रामीणों की मांग यही रही है कि उन्हें ऐसी जगह बसाया जाए जहां उनका परिवार सुरक्षित तरीके से दोबारा जिंदगी शुरू कर सके।
हर बारिश के साथ डर बढ़ जाता है
गंगा किनारे रहने वाले परिवारों के लिए बारिश का मौसम सिर्फ पानी बढ़ने का डर नहीं लाता। उन्हें जमीन खिसकने और कटाव बढ़ने की चिंता भी रहती है।
आज जिस जगह घर सुरक्षित दिखाई देता है, कुछ समय बाद वही जमीन नदी के बिल्कुल करीब पहुंच सकती है। यही वजह है कि कटाव प्रभावित इलाकों में रहने वाले परिवार लगातार असुरक्षा के बीच जिंदगी गुजारते हैं।



