स्थानीय महावीर चौराहा स्थित राजपूत सोलंकी परिवार के कुलदेवता जुंजार मालदेव एवं सती माता मंदिर का दसवां वार्षिकोत्सव पारंपरिक श्रद्धा, हर्षोल्लास और धूमधाम के साथ संपन्न हुआ। इस गौरवशाली अवसर पर सोलंकी राजपूत परिवार द्वारा भव्य ध्वजारोहण कार्यक्रम का आयोजन किया गया, जिसमें संपूर्ण क्षेत्र के श्रद्धालुओं ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया।
वैदिक मंत्रोच्चार के बीच शिखर पर लहराई ध्वजा
उत्सव की शुरुआत अलसुबह विशेष पूजा-अर्चना के साथ हुई। इसके बाद पंडित नरोत्तमलाल के आचार्यत्व में वैदिक मंत्रोचार के बीच अभिजीत मुहूर्त में मंदिर के शिखर पर गाजे-बाजे के साथ नवीन ध्वजा चढ़ाई गई। महाआरती के दौरान पूरा परिसर "जय जुंजार बावजी" और "जय सती माता" के गगनभेदी जयकारों से गुंजायमान हो उठा। सुबह से ही मंदिर में दर्शन के लिए श्रद्धालुओं का तांता लगा रहा।
जब भीनमाल की रक्षा के लिए वीर मालदेव ने दिया बलिदान
समारोह के दौरान इतिहासकार हरीसिंह सोलंकी ने गढ़मगा रावों की बही और ऐतिहासिक साक्ष्यों के आधार पर जुंजार मालदेव सोलंकी की वीरता और शौर्य की गौरवगाथा सुनाई। उन्होंने बताया कि ईस्वी सन 1545 में सिरोही के महाराजा रायसिंह ने विशाल सेना के साथ भीनमाल को चारों तरफ से घेर लिया था। उस समय भीनमाल गढ़ की रक्षा के लिए मालदेव सोलंकी ने वीरतापूर्वक युद्ध करते हुए मातृभूमि की रक्षा में अपने प्राण न्यौछावर कर दिए।
बताया गया कि युद्ध के दौरान मालदेव सोलंकी के बाण से सिरोही के महाराजा गंभीर रूप से घायल हो गए, जिससे उनकी सेना में भगदड़ मच गई और फौज को वापस लौटना पड़ा। वीरगति प्राप्त करने के बाद उनकी ठकुरानियां माणककंवर राठौड़ एवं जसकंवर चौहान सती हो गईं। शौर्य और बलिदान की यह गाथा सुनकर उपस्थित श्रद्धालु भावुक हो उठे।
सर्वसमाज की रही सहभागिता
इस धार्मिक और ऐतिहासिक आयोजन में कौमी एकता और सामाजिक समरसता की मिसाल देखने को मिली। कार्यक्रम में सोलंकी परिवार सहित सर्वसमाज के गणमान्य नागरिकों ने भाग लिया। दिनभर चले आयोजन में महाप्रसाद का आयोजन भी किया गया, जिसमें सैकड़ों श्रद्धालुओं ने प्रसादी ग्रहण की। मंदिर कमेटी और सोलंकी परिवार ने कार्यक्रम को सफल बनाने में सहयोग करने वाले सभी आगंतुकों का आभार व्यक्त किया।




