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भाद्रपद मास में क्या खाएं, किन चीजों से बचें? जानें शास्त्रीय नियम

भाद्रपद मास में खानपान को लेकर शास्त्रों में कई नियम बताए गए हैं। जानिए इस महीने क्या खाना चाहिए और किन चीजों से दूरी रखें।

Enews Bharat1 September 2026
भाद्रपद मास में क्या खाएं, किन चीजों से बचें? जानें शास्त्रीय नियम

शास्त्रों में भाद्रपद मास के खानपान को लेकर क्या नियम हैं?

हिंदू पंचांग में भाद्रपद मास, जिसे आम बोलचाल में भादो का महीना भी कहा जाता है, धार्मिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। 2026 में भाद्रपद मास की शुरुआत 29 अगस्त से हुई है और यह महीना सितंबर के अंत तक चलेगा। इस दौरान भगवान श्रीकृष्ण की जन्माष्टमी, गणेश चतुर्थी, राधाष्टमी और अनंत चतुर्दशी जैसे कई प्रमुख पर्व आते हैं।

भाद्रपद मास में पूजा-पाठ, व्रत, दान और धार्मिक अनुष्ठानों के साथ खानपान को लेकर भी कई परंपरागत नियम बताए गए हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस महीने में सात्विक, हल्का और ताजा भोजन करने तथा कुछ खाद्य पदार्थों से दूरी बनाने की सलाह दी जाती है।

हालांकि, अलग-अलग क्षेत्रों, परिवारों और धार्मिक परंपराओं में इन नियमों में अंतर हो सकता है। इसलिए इन्हें धार्मिक मान्यताओं और परंपराओं के तौर पर ही समझना चाहिए।

भाद्रपद मास में सात्विक भोजन का महत्व

भाद्रपद मास को चातुर्मास का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है। इस दौरान धार्मिक जीवन में संयम, पूजा-पाठ और सात्विक आहार पर जोर दिया जाता है।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस महीने में व्यक्ति को ऐसा भोजन करना चाहिए जो हल्का, ताजा और आसानी से पचने वाला हो। कई परंपराओं में फल, ताजा भोजन और सात्विक आहार को प्राथमिकता देने की बात कही गई है।

सात्विक भोजन का उद्देश्य केवल खानपान तक सीमित नहीं माना जाता, बल्कि इसे मन और व्यवहार में संयम से भी जोड़ा जाता है।

भाद्रपद मास में क्या खाना चाहिए?

भादो के महीने में ताजा और हल्का भोजन करने की परंपरा बताई जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दौरान घर का बना और साफ-सुथरा भोजन करना बेहतर माना जाता है।

कुछ परंपराओं में इस महीने में दूध, घी और मक्खन जैसे खाद्य पदार्थों को भी आहार में शामिल करने की बात कही गई है।

हालांकि, व्रत रखने वाले लोगों के लिए भोजन के नियम अलग हो सकते हैं। व्रत के दौरान व्यक्ति अपनी परंपरा के अनुसार फलाहार या अन्य निर्धारित खाद्य पदार्थ ग्रहण करता है।

भाद्रपद में दही से दूरी की मान्यता

भाद्रपद मास के खानपान नियमों में दही का सेवन न करने की मान्यता सबसे ज्यादा बताई जाती है।

कई धार्मिक और पारंपरिक स्रोतों में भादो के महीने में दही और दही से बनी चीजों से परहेज करने की बात कही गई है।

इसके पीछे कुछ परंपरागत व्याख्याएं मौसम और पाचन से भी जुड़ी हुई हैं। हालांकि, किसी व्यक्ति को दही या डेयरी उत्पादों से परहेज करना चाहिए या नहीं, यह उसकी व्यक्तिगत स्वास्थ्य स्थिति और चिकित्सकीय सलाह पर निर्भर करता है।

हरी पत्तेदार सब्जियों को लेकर क्या मान्यता है?

भाद्रपद मास में कुछ परंपराओं में हरी पत्तेदार सब्जियों से दूरी बनाने की सलाह दी जाती है।

इस मान्यता के पीछे वर्षा ऋतु का तर्क दिया जाता है। बारिश और नमी के मौसम में पत्तेदार सब्जियों की सफाई और संरक्षण को लेकर अतिरिक्त सावधानी की जरूरत हो सकती है। कुछ धार्मिक स्रोतों में इस दौरान हरी सब्जियों के सेवन से बचने की बात कही गई है।

हालांकि, आज के समय में सब्जियों को अच्छी तरह धोकर और सही तरीके से पकाकर खाना खाद्य सुरक्षा के लिहाज से महत्वपूर्ण है।

बैंगन और मूली से भी परहेज की परंपरा

भादो के महीने में बैंगन और मूली से परहेज करने की परंपरा भी कुछ धार्मिक मान्यताओं में मिलती है। इसके पीछे मौसम और खानपान से जुड़े पारंपरिक कारण बताए जाते हैं।

यह नियम सभी हिंदू परिवारों या समुदायों में समान रूप से लागू हो, ऐसा जरूरी नहीं है। इसलिए इसे एक धार्मिक परंपरा के रूप में ही देखा जाना चाहिए।

बासी और तामसिक भोजन से बचने की सलाह

भाद्रपद मास में बासी भोजन से बचने और ताजा भोजन करने की सलाह दी जाती है। इसके अलावा कई धार्मिक परंपराओं में तामसिक भोजन और मांसाहार से भी दूरी बनाने की बात कही जाती है।

इस महीने को पूजा-पाठ और साधना का समय मानने वाले लोग भोजन में भी संयम रखने पर जोर देते हैं।

गुड़ और शहद को लेकर क्या कहा गया है?

कुछ परंपरागत नियमों में भाद्रपद मास के दौरान गुड़ और शहद के सेवन से बचने की बात कही गई है।

हालांकि, अलग-अलग धार्मिक परंपराओं में इन खाद्य पदार्थों को लेकर अलग मान्यताएं हो सकती हैं। इसलिए किसी एक नियम को सभी लोगों पर समान रूप से लागू नहीं किया जा सकता।

भाद्रपद मास में मांसाहार और मदिरा से दूरी

सनातन परंपरा में कई धार्मिक महीनों और व्रतों के दौरान सात्विक जीवनशैली अपनाने की बात कही जाती है। भाद्रपद मास में भी कई परिवार मांसाहार और मदिरा से परहेज करते हैं।

धार्मिक दृष्टि से इसे संयम और साधना का हिस्सा माना जाता है।

भाद्रपद मास में क्यों रखा जाता है खानपान में संयम?

भाद्रपद का समय आमतौर पर मानसून के आसपास आता है। पारंपरिक स्वास्थ्य मान्यताओं में इस मौसम में हल्का और ताजा भोजन करने पर जोर दिया जाता है।

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आधुनिक स्वास्थ्य दृष्टि से भी बरसात के मौसम में साफ-सफाई, भोजन को सही तरीके से पकाने और लंबे समय तक रखा हुआ भोजन न खाने जैसी सावधानियां उपयोगी होती हैं।

हालांकि, धार्मिक मान्यताओं और आधुनिक चिकित्सा सलाह को एक ही चीज नहीं माना जाना चाहिए।

भाद्रपद मास में पूजा-पाठ का विशेष महत्व

भाद्रपद मास में भगवान श्रीकृष्ण, भगवान विष्णु और भगवान गणेश की पूजा का विशेष महत्व बताया जाता है। इसी महीने में जन्माष्टमी और गणेश चतुर्थी जैसे बड़े पर्व आते हैं।

भक्त इस दौरान व्रत, जप, ध्यान, पूजा और दान-पुण्य जैसे धार्मिक कार्य करते हैं।

जन्माष्टमी और गणेश चतुर्थी भी इसी महीने

भाद्रपद मास धार्मिक त्योहारों से भरपूर होता है। इस दौरान श्रीकृष्ण जन्माष्टमी और गणेश चतुर्थी जैसे प्रमुख पर्व मनाए जाते हैं। इसके अलावा राधाष्टमी और अनंत चतुर्दशी भी इसी अवधि में आती हैं।

गणेश चतुर्थी के दौरान कई स्थानों पर दस दिवसीय गणपति उत्सव आयोजित किया जाता है, जबकि जन्माष्टमी पर भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव की विशेष पूजा की जाती है।

भाद्रपद में किन बातों का रखें ध्यान?

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस महीने में कुछ लोग निम्न बातों का पालन करते हैं—

  • ताजा और सात्विक भोजन करना

  • बासी भोजन से बचना

  • दही और दही से बनी चीजों से परहेज करना

  • तामसिक भोजन से दूरी रखना

  • मांसाहार और मदिरा से बचना

  • पूजा-पाठ और जप के लिए समय निकालना

  • अपनी क्षमता के अनुसार दान-पुण्य करना

  • व्रत होने पर अपनी परंपरा के नियमों का पालन करना

इनमें से कई नियम अलग-अलग धार्मिक परंपराओं में अलग हो सकते हैं।

क्या भाद्रपद में सभी लोगों को यही भोजन करना चाहिए?

नहीं। धार्मिक खानपान की परंपराएं व्यक्ति, परिवार, क्षेत्र और संप्रदाय के अनुसार अलग हो सकती हैं।

इसके अलावा गर्भवती महिलाओं, बच्चों, बुजुर्गों या किसी स्वास्थ्य समस्या से जूझ रहे व्यक्ति को भोजन में बड़े बदलाव करने से पहले चिकित्सकीय सलाह लेना उचित है।

धार्मिक व्रत या उपवास करते समय भी स्वास्थ्य को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।

भाद्रपद मास में संयम का संदेश

भाद्रपद मास की धार्मिक परंपराओं में केवल खाने-पीने पर रोक ही नहीं, बल्कि संयमित जीवन, पूजा, दान और आत्मचिंतन पर भी जोर दिया जाता है।

इसलिए इस महीने के नियमों को केवल ‘क्या खाना है और क्या नहीं खाना है’ तक सीमित नहीं माना जाता। धार्मिक दृष्टि से यह समय व्यक्ति को अपनी दिनचर्या और आचरण में अनुशासन लाने का अवसर भी देता है।

निष्कर्ष

भाद्रपद मास हिंदू धर्म में विशेष धार्मिक महत्व रखने वाला महीना है। इस दौरान जन्माष्टमी और गणेश चतुर्थी जैसे बड़े त्योहार मनाए जाते हैं और पूजा-पाठ, व्रत तथा दान-पुण्य की परंपरा है।

खानपान को लेकर भी कई परंपरागत नियम बताए गए हैं। इनमें ताजा और सात्विक भोजन करने तथा दही, बासी भोजन और कुछ अन्य खाद्य पदार्थों से परहेज करने की मान्यताएं शामिल हैं।

हालांकि, ये धार्मिक और पारंपरिक मान्यताएं हैं। इन्हें चिकित्सकीय सलाह का विकल्प नहीं समझना चाहिए। स्वास्थ्य और खानपान से जुड़ा कोई विशेष मामला हो तो विशेषज्ञ की सलाह लेना बेहतर है।


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