केंद्रीय भेड़ एवं ऊन अनुसंधान संस्थान अविकानगर द्वारा 18-19 जून 2026 को टोंक जिले की मालपुरा तहसील के कटोली, रामजीपुरा सोडा, घटियाली, रामेश्वरपुरा एवं फागी तहसील के निमेड़ा गांवों में विशेष रात्रि एवं सुबह चौपाल का आयोजन किया गया। यह कार्यक्रम भारत सरकार के “खेत बचाओ अभियान” के तहत आयोजित किया गया, जिसका मुख्य उद्देश्य किसानों को रासायनिक उर्वरकों के अत्यधिक उपयोग से होने वाले नुकसान के प्रति जागरूक करना था।
संस्थान के निदेशक डॉ. अरुण कुमार तोमर के मार्गदर्शन में यह अभियान लगातार चलाया जा रहा है। इस जागरूकता कार्यक्रम में संस्थान की चार वैज्ञानिक टीमों ने विभिन्न गांवों में किसानों को प्राकृतिक खेती और संतुलित उर्वरक उपयोग के बारे में विस्तार से जानकारी दी। साथ ही अविकानगर के क्षेत्रीय केंद्र बीकानेर, गडसा (कुल्लू, हिमाचल प्रदेश) और तमिलनाडु में भी एक-एक टीम सक्रिय रूप से इस अभियान को आगे बढ़ा रही है। सभी टीमों की रिपोर्ट आईसीएआर के ऑनलाइन पोर्टल पर नियमित रूप से अपलोड की जा रही है।
चौपाल में वैज्ञानिकों ने किसानों को संबोधित करते हुए बताया कि रासायनिक खादों के अंधाधुंध प्रयोग से मिट्टी की गुणवत्ता खराब होती है और मानव स्वास्थ्य पर भी गंभीर दुष्प्रभाव पड़ते हैं। उन्होंने किसानों से आग्रह किया कि वे अपने खेत की मिट्टी की जांच अवश्य करवाएं और कृषि विभाग की सिफारिशों के अनुसार ही संतुलित मात्रा में उर्वरकों का उपयोग करें।
वैज्ञानिकों ने किसानों को जैविक खेती अपनाने की सलाह देते हुए देशी सड़ी गोबर की खाद, केंचुआ खाद (वर्मीकम्पोस्ट), बायोफर्टिलाइजर, राइजोबियम कल्चर, एजोटोबैक्टर, पीएसबी और एजोस्पाइरिलम जैसे प्राकृतिक विकल्पों के उपयोग पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि इन उपायों से न केवल मिट्टी की उर्वरता बढ़ती है बल्कि उत्पादन लागत में भी कमी आती है, जिससे किसानों की आय में वृद्धि संभव है।
कार्यक्रम के दौरान किसानों को प्राकृतिक खेती अपनाने के लिए प्रेरित किया गया और कहा गया कि यह अभियान देश की मिट्टी को बचाने और भविष्य की कृषि को सुरक्षित बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। निदेशक डॉ. अरुण कुमार तोमर ने किसानों से अपने घरों से ही प्राकृतिक खेती की शुरुआत करने का आग्रह किया।
उन्होंने बताया कि इस चौपाल में कुल 294 किसानों ने भाग लिया, जिनमें 201 पुरुष और 93 महिलाएं शामिल थीं। सभी किसानों ने मिट्टी और खेती को बचाने का संकल्प लिया। इस अभियान में डॉ. सिद्धार्थ सारथी मिश्र, डॉ. सत्यवीर सिंह डांगी, डॉ. सुभाष कच्छवाहा, डॉ. हरिसिंह मीना, डॉ. अमरसिंह मीना, डॉ. नपेंद्र सिंह, डॉ. रंगलाल मीना, डॉ. दुष्यंत कुमार शर्मा, डॉ. रणजीत सिंह गोदारा, डॉ. गौतम चोपड़ा, महाराम मीना, डॉ. सृष्टि सोनी, डॉ. गरिमा चौधरी, योगिराज मीना, डी.के. यादव एवं सुरेंद्र सहित कई वैज्ञानिकों ने सहयोग किया।




