Afternoon Puja Rules: क्या दोपहर में पूजा करना शुभ है या अशुभ? जानिए शास्त्रों का मत
सनातन धर्म में पूजा-पाठ के लिए समय का विशेष महत्व माना गया है। शास्त्रों के अनुसार ब्रह्म मुहूर्त और प्रातःकाल को भगवान की आराधना के लिए सबसे उत्तम समय माना जाता है। हालांकि, आज की व्यस्त जीवनशैली में कई लोग सुबह पूजा नहीं कर पाते और दोपहर में स्नान कर पूजा-अर्चना करते हैं। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या दोपहर में पूजा करना शुभ होता है या अशुभ? आइए जानते हैं कि शास्त्र इस विषय में क्या कहते हैं।
क्या दोपहर में नई पूजा शुरू करनी चाहिए?
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, दोपहर 12 बजे से शाम 4 बजे तक का समय देवी-देवताओं के विश्राम का समय माना जाता है। इसी कारण कई मंदिरों में इस अवधि के दौरान गर्भगृह के द्वार बंद कर दिए जाते हैं ताकि भगवान के विश्राम में बाधा न आए।
इसी वजह से शास्त्रों में इस समय नई पूजा, विशेष अनुष्ठान या आराधना शुरू करने से बचने की सलाह दी गई है।
किन परिस्थितियों में दोपहर की पूजा दोषरहित मानी जाती है?
हालांकि सामान्य परिस्थितियों में दोपहर में नई पूजा शुरू करना उचित नहीं माना जाता, लेकिन कुछ विशेष स्थितियों में इसकी अनुमति दी गई है।
1. लंबी पूजा या हवन जारी हो
यदि कोई धार्मिक अनुष्ठान या हवन सुबह प्रारंभ हुआ हो और स्वाभाविक रूप से दोपहर तक चलता रहे, तो इसे दोषरहित माना जाता है।
2. अभिजीत मुहूर्त में पूजा
नवरात्रि जैसे विशेष पर्वों पर यदि सुबह का शुभ मुहूर्त छूट जाए, तो अभिजीत मुहूर्त में कलश स्थापना या अन्य आवश्यक पूजा की जा सकती है।
3. राहुकाल में विशेष उपाय
कुछ विशेष धार्मिक उपाय, जैसे कालसर्प दोष निवारण से जुड़े अनुष्ठान, राहुकाल में ही किए जाते हैं। ऐसे मामलों में दोपहर के समय पूजा करना शास्त्रसम्मत माना गया है।
दोपहर में भगवान की पूजा कैसे करें?
यदि आप दोपहर में भगवान के प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त करना चाहते हैं, तो शास्त्र मानसिक पूजा का मार्ग बताते हैं।
भगवान का नाम जप करें।
मन ही मन प्रार्थना करें।
ईश्वर का स्मरण और धन्यवाद करें।
मूर्तियों को स्पर्श किए बिना श्रद्धापूर्वक ध्यान करें।
मान्यता है कि इस प्रकार की मानसिक पूजा भी अत्यंत शुभ और फलदायी होती है।




