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सात दिवसीय भागवत कथा

सात दिवसीय भागवत कथा का शुभारंभ: सोकंदा गांव में संगीतमय श्रीमद्भागवत कथा से गूंजा भक्ति का वातावरण

मांगरोल, संवाददाता: जयप्रकाश शर्मा

 

मांगरोल तहसील क्षेत्र के सोकंदा गांव में सात दिवसीय भागवत कथा का भव्य शुभारंभ गुरुवार को श्रद्धा और भक्ति के वातावरण में हुआ। ग्रामीणों के सामूहिक सहयोग से शिव भगवान मंदिर परिसर में आयोजित इस संगीतमय श्रीमद्भागवत कथा के पहले ही दिन बड़ी संख्या में श्रद्धालु कथा श्रवण के लिए पहुंचे। सात दिवसीय भागवत कथा के शुभारंभ के साथ ही पूरे गांव में आध्यात्मिक ऊर्जा और भक्तिमय माहौल देखने को मिला।

 

सात दिवसीय भागवत कथा के पहले दिन मंदिर परिसर श्रद्धालुओं से खचाखच भरा रहा। गांव के साथ-साथ आसपास के क्षेत्रों से भी भक्त कथा सुनने पहुंचे। भजन-कीर्तन और संगीतमय प्रस्तुति ने वातावरण को पूरी तरह आध्यात्मिक बना दिया।

 

सोकंदा गांव में भक्ति और श्रद्धा का माहौल 

सोकंदा गांव का शिव भगवान मंदिर इन सात दिनों के लिए भक्ति का प्रमुख केंद्र बन गया है। सात दिवसीय भागवत कथा के आयोजन से गांव में सुबह से शाम तक धार्मिक गतिविधियां चल रही हैं। श्रद्धालु कथा स्थल पर पहुंचकर भक्ति भाव से कथा श्रवण कर रहे हैं।

 

इस सात दिवसीय भागवत कथा के आयोजन में ग्रामीणों का सामूहिक सहयोग देखने को मिला। व्यवस्थाओं से लेकर प्रसाद वितरण तक हर कार्य में गांव के लोग सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं, जिससे सामाजिक एकता और धार्मिक भावना और मजबूत हुई है।

 

पंडित ऋषिराज शर्मा का प्रेरणादायक प्रवचन 

कथावाचक पंडित ऋषिराज शर्मा ने सात दिवसीय भागवत कथा के पहले दिन कहा कि भागवत कथा का श्रवण मात्र से ही मनुष्य को पापों से मुक्ति मिलती है। उन्होंने बताया कि जिस स्थान पर भागवत कथा होती है, वहां स्वयं भगवान विराजमान रहते हैं। पंडित शर्मा ने कहा कि भगवान के नाम का जाप करने से जीवन की सभी विपत्तियों का नाश हो जाता है। सात दिवसीय भागवत कथा के माध्यम से व्यक्ति अपने जीवन को सही दिशा में ले जा सकता है।

 

भागवत कथा का आध्यात्मिक महत्व 

कथावाचक ने कहा कि इस संसार में भगवत कृपा के बिना कुछ भी संभव नहीं है। सात दिवसीय भागवत कथा मनुष्य को यह सिखाती है कि अहंकार छोड़कर ईश्वर पर विश्वास करना ही जीवन का सार है। उन्होंने कहा कि श्रीमद्भागवत कथा अमृत के समान है। इसका जितना भी पान किया जाए, आत्मा कभी तृप्त नहीं होती। सात दिवसीय भागवत कथा आत्मिक शांति और मानसिक संतुलन प्रदान करती है।

 

कर्म सिद्धांत और श्रीकृष्ण का संदेश 

पंडित ऋषिराज शर्मा ने भगवान श्रीकृष्ण के वचनों का उल्लेख करते हुए कहा कि कर्म ही प्रधान है। बिना कर्म के कुछ भी संभव नहीं है। सात दिवसीय भागवत कथा के माध्यम से कर्म सिद्धांत को सरल शब्दों में समझाया गया। उन्होंने कहा कि जो व्यक्ति अच्छे और सत्कर्म करता है, उसे सदैव अच्छा फल मिलता है, जबकि बुरे कर्म करने वाले को बुरे परिणाम भुगतने पड़ते हैं। इसलिए प्रत्येक मनुष्य को अच्छे कर्मों के प्रति आकर्षित होना चाहिए।

 

गोकर्ण और धुंधकारी प्रसंग से शिक्षा 

कथावाचक ने गोकर्ण और धुंधकारी प्रसंग का उल्लेख करते हुए बताया कि जब गोकर्ण द्वारा कही गई कथा को उनके दुराचारी भाई धुंधकारी ने मनोयोग से सुना, तो उसे भी मोक्ष की प्राप्ति हुई। यह प्रसंग सात दिवसीय भागवत कथा की महिमा को दर्शाता है। उन्होंने कहा कि जीवन में दो मार्ग होते हैं—एक दमन का और दूसरा उदारीकरण का, लेकिन दोनों ही मार्गों में अधोगामी वृत्तियों का निषेध है। सात दिवसीय भागवत कथा मनुष्य को संयम और संतुलन का मार्ग दिखाती है।

 

ग्रामीणों का सहयोग और आयोजन की व्यवस्था 

सात दिवसीय भागवत कथा संगीतमय रूप में प्रस्तुत की जा रही है। भजन, कीर्तन और कथा वाचन से वातावरण पूरी तरह भक्तिमय बना हुआ है। ग्रामीणों द्वारा श्रद्धालुओं के लिए प्रसाद और अन्य व्यवस्थाएं की गई हैं। सेवा भाव के साथ किया गया यह आयोजन समाज में सकारात्मक संदेश दे रहा है।

 

भागवत कथा से समाज को मिलने वाला संदेश 

सात दिवसीय भागवत कथा केवल धार्मिक आयोजन नहीं है, बल्कि यह समाज को नैतिक और सामाजिक मूल्यों की शिक्षा भी देती है। कथा के माध्यम से सत्य, अहिंसा और करुणा का संदेश दिया जा रहा है।

 

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