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मोबाइल संस्कृति

मोबाइल संस्कृति: बच्चों के भविष्य पर मंडराता सबसे बड़ा खतरा प्रगति या विनाश ?

सीकर, संवाददाता: विजय कुमार 

 

आज यह लेख जानकारी नहीं,बल्कि एक चेतावनी है उस हर शख्स के लिए जो सच मे अपने बच्चों का भविष्य सुधारना या उसको बचाना चाहता है एक ऐसी चेतावनी,जो हर मां–बाप के लिए है , हर उस शिक्षक के लिए है ,और हर उस समाज के लिए है जो अपने बच्चों को एक सुनहरा भविष्य सौंपना चाहता है।

 

मोबाइल संस्कृति: एक ख़ामोश खतरा

आज हम बात करेंगे—मोबाइल संस्कृति की …..वह संस्कृति,जो धीरे–धीरे,बिना आवाज़ किए,हमारे बच्चों का दिमाग, शरीर, सोच, संस्कार और सपना—सब कुछ बदल रही है सबको तहस नहस कर रही है और वो भी इतनी शांति से की किसी को भनक तक नहीं ।

 

मोबाइल संस्कृति का असली मतलब

देखिए मोबाइल संस्कृति का अर्थ केवल फोन रखना ही नहीं है ।….. मोबाइल संस्कृति का मतलब है—हर समस्या का समाधान स्क्रीन में ढूंढना ….. हर भावना को रील में बदल देना , हर रिश्ते को नोटिफिकेशन से तौलना और हर खालीपन को मोबाइल से भर देना …. आज मोबाइल—शिक्षक बन गया , दोस्त बन गया , माँ बाप बन गया और कई मामलों में तो … भगवान भी …. तो आप अब कमेन्ट में बताईए की हम मोबाईल को रिश्तों मे कॉनसी वरीयता दें ।

 

मोबाइल का भारत में प्रवेश: एक याद

आईए बढ़ते है आगे देखिए सन 2000 से पहले भारत में मोबाईल का इतना चाल चलन नहीं था मुझे आज भी याद है की हमारे घर पर lane लाइन वाला फोन हुआ करता था जो सप्ताह में कभी कभार बजता था ना कोई विडिओ कॉल और ना ही कोई व्हाट्सप्प ।

 

सुविधा से लत तक का सफ़र

साल 2000 में भारत के घरों मे मोबाइल आया और लोगों को लगा की ये तो बड़े काम की चीज है , 2010 में यही मोबाईल नाम की वस्तु सुविधा बना , 2020 के बाद… आदत बनी और 2025 तक आते आते यही वस्तु बन गई … लत ।

 

आंकड़े जो डराते हैं

आज भारत—दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा स्मार्टफोन बाज़ार है , 85% घरों में स्मार्टफोन मिलेगा और 10 साल से कम उम्र के 70% बच्चों के पास या तो निजी मोबाइल है या अनलिमिटेड एक्सेस और इसी मुद्दे पर हम आज बात कर रहे है की ये वास्तव में है क्या ….प्रगति है या विनाश ।

 

मां, मोबाइल और मासूम बचपन

आप इस प्रगति को इस तरह समझना की घर के कामों मे लगी एक माँ अपनी नन्ही सी जान के हाथ में मोबाईल इस तरह देकर काम करने लगती है जैसे मोबाईल उसका ध्यान रख रहा हो लेकिन उसे नहीं पता की उसके बच्चे के माइन्ड की ग्रोथ उसी वक्त से रुक चुकी होती है ।

 

स्क्रीन से पालन-पोषण

बच्चों को खाना खिलाने के लिए मोबाइल दिखाती है रोते बच्चे को चुप कराने के लिए रील दिखाने लगती है ये कैसा पालन पोषण है । कार्टून बनाम पेरेंटिंग एसा लग रहा है जैसे कार्टून और पैरेंटिंग बराबर पायदान पर खड़े है और एक दूसरे को चुनौती दे रहे है की मैं तुमसे बड़ा ….मैं तुमसे बड़ा ।

 

0 से 5 साल: वैज्ञानिक चेतावनी

जबकि वैज्ञानिक इस बात को एक चेतावनी देकर समझाने की कोशिश कर रहे है की इस उम्र में जो वो 0 से 5 साल बता रहे है , स्क्रीन से दिमाग की प्राकृतिक ग्रोथ रुकती है बोलने में देरी और बच्चे का परिवार के प्रति भावनात्मक जुड़ाव कम हो सकता है ।

 

WHO की रिपोर्ट क्या कहती है

WHO…..यानि world health organisation की reports भी यहीं दावा करती है की 2 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए एक स्क्रीन ज़हर के समान है ।

 

6 से 12 साल: सोचने की उम्र

जिस उम्र में एक बच्चा स्कूल मे enter होता है ये घड़ी उसकी ध्यान लगाने और चीजों को समझने की होती है 6–12 साल इस उम्र में—बच्चा सवाल पूछता है कल्पना करता है सीखता है लेकिन मोबाइल का प्रभाव इतना होता है की वह उसे ना तो सोचने देता है ना ही समझने देता है बिल्कुल तैयार जवाब देता है और इसी तरह बच्चा संघर्ष से दूर होता चला जाता है ।

 

एकाग्रता में भारी गिरावट

reports की माने तो इस उम्र यानि 6 से 12 साल के बच्चों में एकाग्रता यानि Concentration Power 45% घटी है किताब पढ़ने का समय भी औसतन 10 मिनट से भी कम हो गया है जो एक बच्चे की शिक्षा का आधार तैयार करती है ।

 

किशोर अवस्था: सबसे बड़ा जोखिम

लेकिन सबसे पहले इस बात को समझिए की उम्र की एक बड़ी महत्वपूर्ण केटेगरी ..और है जिसे हम कहते है.. किशोर अवस्था ….और इस उम्र में अगर स्क्रीन की लत लग गई तो समझो इसके जंजाल से बाहर निकलना बहूत मुस्किल हो जाता है और scientist भी मोबाईल को सबसे बड़ा खतरा इसी उम्र के लिए बता रहे है ।

 

खोखली होती नींव

जो उम्र नींव डालने की होती है लेकिन मोबाइल की लत इस नींव को खोखला कर देती है ।

 

मानसिक समस्याएं: तुलना की बीमारी

आईए रुख करते है समस्याओ पर की क्या है समस्या सबसे पहली है मानसिक समस्या जहां आपका बच्चा दूसरों से खुद की तुलना करने लगता है की वो एसा है तो मैं एसा क्यू हूँ उसके पास ये सब है लेकिन मेरे पास ये सब क्यूँ नहीं है आपने भी कभी तो अपने बच्चे के बिहैव में एसा बर्ताव देखा होगा जिसमे वह दूसरों का उदाहरण लेकर खुद को वहा रखता है और इसे ही कहते है तुलना करने की बीमारी और इसकी जड़ है मोबाईल स्क्रीन ।

 

Body Shaming का सच

Body Shaming……body shaming उस स्थिति को कहते है जब बॉडी की बनावट को लेकर कोई भी आदमी खुद को इतना लो फ़ील करवाने लगता है की उसे खुद से नफरत होने लगती है और यह स्थिति भी दूसरों से तुलना करने या स्क्रीन पर समय बिताने का एक नकारात्मक पहलू है

 

नोएडा की घटना

कुछ दिनों पहले की बात है उत्तर प्रदेश के नोएडा में एक बैंक एम्प्लोयी थी 27 साल की उसने बॉडी shaming के चलते और लगातार लोगों से बॉडी shaming se पीड़ित होकर खुद की जिंदगी को समाप्त कर लिया ।

 

उम्र नहीं देखता मोबाइल

अब कोई कह सकता है क्या की कोई बैंक एम्प्लोयी भी आत्महत्या कर सकती है वो भी सिर्फ इस वजह से की उसे खुद को लेकर लो फील हुआ 

 

Virtual Validation की लत

लेकिन दोस्तों मोबाईल किसी उम्र को नहीं देखता उसका जैसा उपयोग होगा उसका रिजल्ट वेस ही निकलकर आएगा आज लोगों को loe self esteem feel होना vertual validation की लत लगना instagram snapchat youtube pr sceen time बर्बाद कर्ते देख यही दुख होता है की जिस पीढ़ी को अपना सेल्फ dovelopment करना चाहिए आज वहीं शांत बैठकर स्क्रीन स्क्रॉल कर रहे है ।

 

Like = Dopamine?

आज की युवा पीढ़ी हर लाइक को dopamine secration का base मान रही है…… हर view को validation करार दे रहे है क्या यही है authenticity क्या इसी तरह हमारे बच्चे आगे बढ़ेंगे ।

 

दिखावा और नकली पहचान

आज हम लगातार दिखावे की ओर धकेले जा रहे है जिसमे एसा होता है की अगर दिखाओगे, तभी मान्य हो fack personality real life से दूरी अकेलापन यही हमे आज उपहार में मिल रहा है ।

 

Online Gaming का खतरनाक जाल

आपको सबको पता होगा की आज digital अनलाइन गेम कितने खतरनाक होते जा रहे है रोज हम नई नई खबरे सुनते है जिसमे किसी की sucide का जिक्र होता है किसी मे साइबर क्राइम froud का उदाहरण मिलता है ।

 

Blue Whale से BGMI तक

हमने पहले कई एसे उदाहरण देखे है जैसे blue whale , PUBG , FREE FIRE , BGMI इन गेम्स का शिकार होकर कई परिवारों ने अपने बच्चों को खोया है कई परिवारों ने अपनी पूंजी दांव पर लगाई है ।

 

Gaming Addiction के परिणाम

इन सारे गेम्स का रिजल्ट क्या निकलकर आता है यहीं की
नींद खत्म, आक्रामकता, पढ़ाई से नफरत, पैसे की चोरी और हमारे बच्चों की समाज से दूरी

 

मानसिक बीमारी बन चुकी लत

आज भारत में Gaming Addiction को मानसिक बीमारी माना जा चुका है जिसका इलाज बड़ा महंगा और time टेकिंग है ….. आज मोबाईल ने हमारे बच्चोंको बड़ा दिखा तो दिया है लेकिन समझदार नहीं बनाया है उनमे वो सब कुछ करने का सामर्थ्य आ तो गया है लेकिन उसको utilize केसे करना है ये मोबाईल संस्कृति ने दबा दिया है ।

 

साइबर अपराध और अश्लीलता

आज लगातार भारत में ऑनलाइन फ्रॉड , अश्लील कंटेंट , साइबर बुलिंग , ब्लैकमेल जैसी घटनाए बढ़ रही है जो कहीं ना कहीं मोबाईल संस्कृति का ही उप उत्पाद है

 

एक कमरे में परिवार, अलग-अलग दुनिया

आज हम लगातार भारतीय समाज में परिवारों का विघटन देख रहे है …..परिवार एक कमरे में लेकिन सब अलग–अलग दुनिया में मोबाइल ने—संवाद छीना, संवेदना छीनी, संस्कार छीने …..और कितने example बताऊ आपको….

 

शारीरिक विनाश: AIIMS की रिपोर्ट

शारीरिक विनाश भी एक बड़ा चिंता का कारण है AIIMS की मेडिकल रिपोर्ट का दावा है की Neck Syndrome , Early Obesity , आंखों की कमजोरी , हार्मोनल डिसबैलेंस के लगातार hospitals में case बढ़ते जा रहे है , doctors इसका कारण बताते हुए कहते है की लगातार मोबाईल का use और बिना physical activity के लगातार मोबाईल के use से आज इस प्रकार की और अजीबोगरीब बीमारियों ने जन्म लिया है ।

 

शिक्षा पर असर

विशेषज्ञ बताते है की मोबाईल के प्रभाव से शिक्षा भी अछूती नहीं है आज अनलाइन एजुकेशन के लिए भले ही मोबाईल जरूरी है लेकिन दोस्तों discipline , evaluation , less affect of teacher , down society value ।

 

भविष्य का समाज कैसा होगा?

आज ये सवाल आकर खड़ा होता है की अगर यहीं चलता रहा तो हमारा समाज केस बनेगा , भावनाहीन पीढ़ी , संघर्षहीन युवा , तात्कालिक सोच वाला समाज आज हमारे समाज के लिए काफी संवेदनशील हो गया है

 

कानून और नीतियां: अधूरी तैयारी

अब सवाल ये भी है की ….. है क्या एसी नीति या कानून जिसके आधार पर हम ये कह सकते है की भारत मोबाईल के दुसप्रभाव से निपटने के लिए तैयार है तो एसके नाम पर हमारे पास online गेम्स पर 28% जीएसटी है । लेकिन वर्तमान में जो समस्याए है जैसे स्क्रीन टाइम को regulate करने के लिए कोई dedicated low ..तो एसा कोई low अभी भारत में विद्यमान नहीं है ।

 

ऑस्ट्रेलिया का उदाहरण

कुछ दिनों पहले हमने सुना था की ऑस्ट्रेलिया ने 15 साल से छोटे बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर अकाउंट बनाने के लिए रेग्युलेशन डिसाइड कीये गए थे इसके पीछे ऑस्ट्रेलिया सरकार का साफ तर्क यहीं था की वे आने वाली नई पीढ़ियों को वास्तविक दुनिया से बाहर नहीं करना चाहते ।

 

अंतिम बात

मोबाइल एक तकनीक है , संस्कृति नहीं , इसका उसे हम अगर अपनी सुविधवों के लिए करेंगे तो सही रहेगा , कोई भी तकनीकी तब खराब बन जाती है जब उसका use मानवीय रिश्तों से ऊपर जाकर किया जाने लगे । अगर आज हमने सीमा तय नहीं की , तो कल इतिहास हमें माफ़ नहीं करेगा। 

 

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