अटल बिहारी वाजपेयी जयंती हर साल भारतीय राजनीति को यह याद दिलाती है कि विचारधाराओं के टकराव के बावजूद भी रिश्तों में गरिमा कैसे निभाई जाती है| भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी सिर्फ एक प्रधानमंत्री नहीं थे, बल्कि वह राजनीति में संवाद, सहिष्णुता और शालीनता की मिसाल थे। नेहरू-गांधी परिवार से वैचारिक मतभेद होने के बावजूद उनके संबंध हमेशा सम्मानपूर्ण बने रहे। अटल बिहारी वाजपेयी जयंती इस बात का प्रतीक है कि मजबूत विपक्ष भी देशहित में सरकार का साथ दे सकता है। उन्होंने संसद से लेकर सड़क तक कभी विरोध को व्यक्तिगत दुश्मनी में नहीं बदला। यही कारण है कि उन्हें ‘अजातशत्रु’ कहा गया।
जवाहरलाल नेहरू और अटल बिहारी वाजपेयी जयंती का ऐतिहासिक संबंध
अटल बिहारी वाजपेयी जयंती के मौके पर पंडित जवाहरलाल नेहरू से उनका रिश्ता सबसे ज्यादा चर्चा में रहता है। 1957 में जब अटल बिहारी वाजपेयी पहली बार लोकसभा पहुंचे, तब उनकी भाषण शैली ने नेहरू को गहराई से प्रभावित किया। नेहरू ने उन्हें एक विदेशी मेहमान से मिलवाते हुए कहा था— “यह युवक एक दिन भारत का प्रधानमंत्री बनेगा।” अटल बिहारी वाजपेयी जयंती हमें याद दिलाती है कि नेहरू ने एक विपक्षी नेता में भविष्य का प्रधानमंत्री देखा था। यह भारतीय लोकतंत्र की परिपक्वता का सबसे बड़ा उदाहरण माना जाता है।
अटल बिहारी वाजपेयी जयंती और ‘चर्चिल’ वाला मशहूर किस्सा
अटल बिहारी वाजपेयी जयंती से जुड़ा सबसे रोचक किस्सा संसद में दिया गया उनका भाषण है। एक बार संसद में बोलते हुए अटलजी ने पंडित नेहरू की तुलना ब्रिटेन के तत्कालीन नेताओं विंस्टन चर्चिल और नेविल चैंबरलेन से कर दी। यह तुलना उस दौर में काफी साहसिक मानी गई। अटल बिहारी वाजपेयी जयंती के इतिहास में खास बात यह रही कि नेहरू इस आलोचना से नाराज़ नहीं हुए। बल्कि बाद में एक भोज में नेहरू ने मुस्कुराते हुए कहा— “भाषण बहुत दमदार था।” यही वह क्षण था जब अटल ने नेहरू को ‘चर्चिल’ कहकर भी सम्मान की मिसाल कायम की।
इंदिरा गांधी और अटल बिहारी वाजपेयी जयंती: विरोध में भी राष्ट्रहित
अटल बिहारी वाजपेयी जयंती के संदर्भ में इंदिरा गांधी से उनके रिश्ते उतार-चढ़ाव से भरे रहे। अटलजी इंदिरा गांधी के सबसे मुखर आलोचकों में से एक थे, लेकिन निजी संबंधों में संवाद बना रहा। अटल बिहारी वाजपेयी जयंती यह दिखाती है कि लोकतंत्र में विरोध का मतलब विरोधी से दुश्मनी नहीं होता। आपातकाल के बाद भी उन्होंने व्यक्तिगत कटुता को राजनीति पर हावी नहीं होने दिया।
बांग्लादेश मुक्ति संग्राम में अटल का ऐतिहासिक रुख
अटल बिहारी वाजपेयी जयंती हमें 1971 के बांग्लादेश मुक्ति संग्राम की याद दिलाती है। इस युद्ध के दौरान अटल बिहारी वाजपेयी ने इंदिरा गांधी सरकार के फैसलों का खुलकर समर्थन किया। अटल बिहारी वाजपेयी जयंती के इतिहास में यह क्षण बेहद महत्वपूर्ण है जब उन्होंने कहा— भारत और बांग्लादेश की मित्रता अटूट है। उन्होंने पाकिस्तान के हमले की निंदा की और बांग्लादेश को मान्यता देने को सही ठहराया। यह राष्ट्रहित में विपक्ष की जिम्मेदारी का उदाहरण था।
राजीव गांधी और अटल बिहारी वाजपेयी जयंती: नई राजनीति की शुरुआत
अटल बिहारी वाजपेयी जयंती के साथ राजीव गांधी से उनके संबंध भी उल्लेखनीय रहे| राजीव गांधी युवा नेतृत्व का प्रतीक थे और अटलजी उन्हें नई पीढ़ी की उम्मीद मानते थे। अटल बिहारी वाजपेयी जयंती यह बताती है कि दोनों नेताओं के बीच वैचारिक मतभेद के बावजूद आपसी सम्मान बना रहा। यही कारण था कि संसद में तीखी बहस के बाद भी व्यक्तिगत संबंध मधुर बने रहे।
अटल बिहारी वाजपेयी जयंती क्यों आज भी प्रासंगिक है
अटल बिहारी वाजपेयी जयंती आज के राजनीतिक माहौल में संवाद और सहमति की सीख देती है। उन्होंने दिखाया कि लोकतंत्र में असहमति भी गरिमा के साथ निभाई जा सकती है। अटल बिहारी वाजपेयी जयंती आने वाली पीढ़ियों के लिए राजनीति की नैतिकता का पाठ है। आज जब राजनीति में कटुता बढ़ रही है, अटलजी का जीवन और उनके रिश्ते एक आदर्श प्रस्तुत करते हैं।
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