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सड़क घोटाला

सीकर सड़क घोटाला: 95 लाख की सड़क 1 दिन में उखड़ी, घटिया निर्माण पर ग्रामीणों का रोष

सीकर | राजस्थान के सीकर जिले में एक बड़ा सड़क घोटाला सामने आया है, जहां 95 लाख रुपए की लागत से बनी सड़क महज़ एक दिन में उखड़ गई। ग्रामीणों का आरोप है कि सड़क निर्माण में बेहद घटिया सामग्री का उपयोग किया गया, जिसके कारण लोगों के पैरों और यहां तक कि कुत्तों के चलने भर से डामर उखड़ने लगी। इस घटना ने विभागीय कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

 

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ग्रामीणों ने डामर को पैर से खुरचा तो सड़क उखड़ गई।

 

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ग्रामीणों ने घटिया निर्माण सामग्री से सड़क बनाने का आरोप लगाया।

 

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यूडीएच राज्यमंत्री झाबर सिंह खर्रा ने 9 सितंबर को नीमकाथाना-अजमेरी रोड से सैंदाला भगवानपुर तक 2.55 किलोमीटर सड़क का शिलान्यास किया था।

95 लाख की सड़क एक दिन में कैसे उखड़ी?

श्रीमाधोपुर ब्लॉक के अजीतगढ़ क्षेत्र में सैंदाला–भगवानपुरा सड़क का निर्माण 10 दिसंबर को पूरा हुआ। लेकिन अगले ही दिन ग्रामीणों ने देखा कि सड़क की ऊपरी डामर परत उखड़कर अलग हो रही है। सीकर सड़क घोटाला का सबसे चौंकाने वाला पहलू यह है कि यह पूरी ढाई किलोमीटर सड़क सिर्फ 24 घंटे में तैयार कर दी गई थी, जो मानकों के विपरीत और गुणवत्ता पर सवाल खड़े करती है।

 

निर्माण कार्य में गंभीर लापरवाही के आरोप

ग्रामीणों ने आरोप लगाया है कि निर्माण में निम्न गुणवत्ता वाले कोलतार और डामर का उपयोग किया गया। सामान्यतः सड़क की एक मज़बूत डामर परत बनाने के लिए मिश्रण, रोलर कम्पैक्शन और सुखाने की पर्याप्त प्रक्रिया की आवश्यकता होती है। लेकिन सीकर सड़क घोटाला में ग्रामीणों का कहना है कि ठेकेदार ने जल्दबाज़ी में सभी मानकों को नजरअंदाज कर दिया।

 

लोगों का आरोप है कि अधिकारियों से शिकायत के बावजूद कार्रवाई नहीं हाे रही है।

ग्रामीणों की नाराज़गी और मौके की तस्वीर

सोशल मीडिया पर वायरल तस्वीरों में ग्रामीणों को पैर से डामर खुरचते हुए देखा गया। सड़क इतनी हल्की थी कि दबाव पड़ते ही डामर हटकर नीचे की परत दिखाई देने लगी। ग्रामीणों का कहना है कि ठेकेदार ने सिर्फ दिखावे का काम किया और सड़क को स्थायी बनाने के बजाय सिर्फ सतही लेयर चढ़ाई। सीकर सड़क घोटाला ने क्षेत्र में भारी रोष पैदा कर दिया है।

 

शिलान्यास, टेंडर और जिम्मेदार विभाग

इस सड़क परियोजना का शिलान्यास 9 सितंबर 2025 को यूडीएच राज्यमंत्री झाबर सिंह खर्रा ने किया था। 2.55 किलोमीटर सड़क के लिए 95 लाख रुपए की मंजूरी दी गई थी। परियोजना PWD विभाग के अधीन थी, लेकिन सीकर सड़क घोटाला ने विभाग की निगरानी प्रणाली पर गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं।

 

सड़क निर्माण टाइमलाइन और उठे सवाल

ग्रामीणों के अनुसार सड़क निर्माण 9 दिसंबर को दोपहर 3 बजे शुरू हुआ और 10 दिसंबर को पूरा कर लिया गया। यह आश्चर्यजनक रूप से तेज़ निर्माण प्रक्रिया दर्शाता है। सामान्य सड़क निर्माण में कई दिन लगते हैं, लेकिन इस मामले में ठेकेदार ने सिर्फ 24 घंटों में करोड़ों की परियोजना पूरी कर दी। सीकर सड़क घोटाला में समयसीमा की यह जल्दबाज़ी भी गुणवत्ता गिरावट का कारण मानी जा रही है।

 

PWD पर लापरवाही के आरोप क्यों भारी पड़े

ग्रामीणों का कहना है कि यह पहली बार नहीं है जब अजीतगढ़ क्षेत्र में सड़कें निर्माण के तुरंत बाद टूटने लगी हों। कई सड़कों में हाल ही में किया गया पेचवर्क भी उखड़ गया। सीकर सड़क घोटाला ने PWD अधिकारियों की जिम्मेदारी और निरीक्षण व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं। ग्रामीणों के अनुसार विभाग ने बिना जांच किए भुगतान जारी किए।

 

लगातार शिकायतों के बावजूद कार्रवाई क्यों नहीं

लोगों का कहना है कि जलेबी चौक से चीपलाटा रोड तक बनी सड़क को लेकर भी कई शिकायतें की गईं, लेकिन अभी तक कोई कार्रवाई नहीं हुई। नए बने ब्लॉक क्षेत्रों में भी सड़कें जगह-जगह से टूट रही हैं। सीकर सड़क घोटाला इस बात का उदाहरण बन गया है कि शिकायतों के बावजूद अधिकारी कार्रवाई नहीं कर रहे और ठेकेदारों को खुली छूट मिली हुई है।

 

सड़क गुणवत्ता पर विशेषज्ञों की राय

सड़क विशेषज्ञों का कहना है कि इतनी जल्दी उखड़ना सीधे तौर पर सामग्री की खराब गुणवत्ता, सही समय पर रोलर न चलाना, तापमान नियंत्रण में लापरवाही और बिटुमिन की गलत मिक्सिंग का संकेत है। विशेषज्ञ मानते हैं कि सीकर सड़क घोटाला सिर्फ निर्माण त्रुटि नहीं, बल्कि निगरानी में भारी चूक भी है। यदि मानकों का पालन किया जाता, तो सड़क वर्षों तक टिक सकती थी।

 

घटना का व्यापक प्रभाव और आगे की जरूरत

सीकर सड़क घोटाला ने सरकार, विभाग, ठेकेदार और प्रशासनिक जिम्मेदारियों पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। करोड़ों रुपए खर्च होने के बाद भी सड़क एक दिन नहीं टिक सकी। इससे न सिर्फ जनता का विश्वास कमजोर हुआ है बल्कि यह सार्वजनिक धन की बर्बादी भी है। विशेषज्ञों और ग्रामीणों का मानना है कि निर्माण कंपनी के खिलाफ सख्त कार्रवाई होनी चाहिए और गुणवत्ता आधारित निगरानी को अनिवार्य किया जाना चाहिए।

 

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