राजस्थान,
Save Aravali Movement अब केवल राजस्थान तक सीमित नहीं रहा। यह मुहिम देशभर में चर्चा का विषय बन चुकी है। सड़क से लेकर सोशल मीडिया तक, हर मंच पर अरावली पर्वतमाला के संरक्षण की मांग तेज होती जा रही है। इसकी वजह है केंद्र सरकार द्वारा प्रस्तावित अरावली की नई वैज्ञानिक परिभाषा, जिसने पर्यावरणविदों, स्थानीय लोगों और विशेषज्ञों की चिंता बढ़ा दी है।
अरावली पर्वतमाला: राजस्थान की लाइफलाइन
हजारों साल पुरानी पर्वतमाला का महत्व, अरावली पर्वतमाला दुनिया की सबसे प्राचीन पर्वतमालाओं में से एक है। Save Aravali Movement के समर्थकों का कहना है कि अरावली केवल पहाड़ों की श्रृंखला नहीं, बल्कि राजस्थान की जीवनरेखा है। यह भूजल रिचार्ज, जलवायु संतुलन और जैव विविधता को बनाए रखने में अहम भूमिका निभाती है।
पुष्कर की रेत पर उभरा विरोध
रेतीले धोरों पर सैंड आर्ट बना विरोध का प्रतीक, तीर्थ नगरी पुष्कर के रेतीले धोरों पर Save Aravali Movement का अनोखा दृश्य देखने को मिला। यहां अंतर्राष्ट्रीय सैंड आर्टिस्ट अजय रावत ने रेत के माध्यम से अरावली संरक्षण का संदेश दिया। करीब 100 टन से अधिक बालू का उपयोग कर बनाई गई यह विशाल कलाकृति लोगों को भावनात्मक रूप से जोड़ने में सफल रही।
सैंड आर्टिस्ट अजय रावत का अनोखा संदेश
कला के जरिए पर्यावरण संरक्षण की अपील, अजय रावत ने सैंड आर्ट के जरिए अरावली को “राजस्थान की लाइफलाइन” के रूप में दर्शाया। Save Aravali Movement के समर्थन में बनाई गई इस कलाकृति ने यह संदेश दिया कि यदि अरावली सुरक्षित नहीं रही, तो राजस्थान का भविष्य भी संकट में पड़ सकता है।
जन-जागरूकता और सरकार तक आवाज
शांतिपूर्ण तरीके से चिंता पहुंचाने का प्रयास, सैंड आर्टिस्ट अजय रावत का कहना है कि यह प्रस्तुति केवल कला नहीं, बल्कि सरकार तक चिंता पहुंचाने का शांतिपूर्ण प्रयास है। Save Aravali Movement के माध्यम से आमजन को अरावली के लगातार हो रहे क्षरण के प्रति जागरूक किया जा रहा है। बड़ी संख्या में स्थानीय लोग और पर्यटक इस सैंड आर्ट को देखने पहुंचे।
केंद्र सरकार की नई वैज्ञानिक परिभाषा
100 मीटर ऊंचाई का मानदंड क्यों विवादित, विवाद की जड़ केंद्र सरकार द्वारा प्रस्तावित अरावली की नई वैज्ञानिक परिभाषा है। इसके तहत केवल 100 मीटर या उससे अधिक ऊंचाई वाली पहाड़ियों को ही अरावली माना जाएगा। Save Aravali Movement के समर्थकों का कहना है कि यह परिभाषा अरावली के बड़े हिस्से को संरक्षण से बाहर कर देगी।
नई परिभाषा पर क्यों है विरोध
संरक्षण से बाहर हो जाएगा बड़ा क्षेत्र, विरोध करने वालों का मानना है कि यदि यह मानदंड लागू हुआ, तो अरावली का बड़ा हिस्सा कानूनी संरक्षण से बाहर हो जाएगा। इससे खनन और निर्माण गतिविधियों को बढ़ावा मिल सकता है। Save Aravali Movement इसी खतरे के खिलाफ खड़ा है।
अरावली के क्षरण का पर्यावरणीय प्रभाव
प्राकृतिक संतुलन पर सीधा असर, अरावली के क्षरण से पर्यावरण पर गंभीर प्रभाव पड़ता है। Save Aravali Movement के तहत विशेषज्ञ लगातार चेतावनी दे रहे हैं कि इससे मरुस्थलीकरण तेज होगा और प्राकृतिक संतुलन बिगड़ेगा।
भूजल, जलवायु और जैव विविधता पर खतरा
आने वाली पीढ़ियों के लिए बढ़ती चिंता, अरावली पर्वतमाला भूजल रिचार्ज में अहम भूमिका निभाती है। इसके कमजोर होने से जलस्तर तेजी से गिर सकता है। साथ ही जलवायु असंतुलन और जैव विविधता को भी गंभीर नुकसान होगा। Save Aravali Movement इन खतरों को लेकर ही देशभर में आवाज उठा रहा है।
सोशल मीडिया से सड़कों तक आंदोलन
डिजिटल प्लेटफॉर्म पर भी तेज हुई मुहिम आज, Save Aravali Movement सोशल मीडिया पर ट्रेंड कर रहा है। लोग पोस्ट, वीडियो और कलात्मक प्रस्तुतियों के जरिए अरावली बचाने की अपील कर रहे हैं। यह आंदोलन अब जन-आंदोलन का रूप लेता जा रहा है
भविष्य की पीढ़ियों के लिए अरावली क्यों जरूरी
आज नहीं चेते तो कल बहुत देर हो जाएगी, Save Aravali Movement का मूल संदेश यही है कि यदि आज अरावली को नहीं बचाया गया, तो आने वाली पीढ़ियों को इसका खामियाजा भुगतना पड़ेगा। यह केवल पर्यावरण का मुद्दा नहीं, बल्कि मानव अस्तित्व से जुड़ा सवाल है।
संरक्षण ही समाधान
सामूहिक प्रयास से ही बचेगी अरावली, सैंड आर्ट से लेकर सोशल मीडिया तक, Save Aravali Movement ने यह साबित कर दिया है कि लोग अरावली के संरक्षण को लेकर गंभीर हैं। अब जरूरत है सरकार, समाज और विशेषज्ञों के मिलकर ठोस कदम उठाने की, ताकि अरावली पर्वतमाला सुरक्षित रह सके।
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