Organic Farming Model Rajasthan आज केवल एक अवधारणा नहीं, बल्कि एक व्यावहारिक और लाभकारी वास्तविकता बनता जा रहा है। राजस्थान जैसे शुष्क और अर्ध-शुष्क राज्य में, जहां खेती को हमेशा जोखिम भरा माना गया, वहां अब ऑर्गेनिक और हाई-वैल्यू फसलों के जरिए किसानों की सोच और आमदनी दोनों बदल रही हैं।
मालपुरा का चांदसेन गांव बना मिसाल
टोंक जिले के मालपुरा उपखंड का चांदसेन गांव आज Organic Farming Model Rajasthan का जीवंत उदाहरण बन चुका है। यह गांव इसलिए खास है क्योंकि यहां खेती को पारंपरिक दायरे से निकालकर आधुनिक, वैज्ञानिक और बाजार-आधारित रूप दिया गया है।
पूर्व DFO हेमंत सिंह हैपावत का विज़न
इस बदलाव के पीछे हैं पूर्व डीएफओ और ईको डेरा रिसॉर्ट के निदेशक हेमंत सिंह हैपावत, जो स्वयं एक सर्टिफाइड ऑर्गेनिक किसान हैं। उन्होंने प्रशासनिक अनुभव और पर्यावरणीय समझ को खेती में उतारकर एक ऐसा मॉडल विकसित किया, जो राजस्थान के किसानों के लिए नई राह दिखा सकता है।
ईको डेरा रिसॉर्ट: खेती की जीवंत प्रयोगशाला
ईको डेरा रिसॉर्ट केवल पर्यटन स्थल नहीं, बल्कि Organic Farming Model Rajasthan की एक जीवंत प्रयोगशाला बन चुका है। यहां परंपरागत खेती के बजाय औषधीय, सुगंधित और सुपरफूड श्रेणी की फसलें उगाई जा रही हैं, जो कम पानी और कम लागत में अधिक मुनाफा देती हैं।
परंपरागत खेती से आगे की सोच
हेमंत सिंह हैपावत का मानना है कि केवल गेहूं, बाजरा, चना और सरसों तक सीमित रहकर किसान अपनी आय नहीं बढ़ा सकते। Organic Farming Model Rajasthan तभी सफल होगा जब किसान फसल चयन, बाजार मांग और वैल्यू एडिशन को समझे।

स्टीविया: शुगर फ्री खेती से स्थायी आय
ईको डेरा में उगाई जा रही स्टीविया आज की हेल्थ-कॉन्शस दुनिया की सबसे महत्वपूर्ण फसल बन चुकी है। यह प्राकृतिक शुगर फ्री विकल्प है, जिसकी मांग डायबिटीज, हेल्थ सप्लीमेंट और आयुर्वेदिक उद्योग में लगातार बढ़ रही है। एक बार रोपण के बाद कई वर्षों तक उत्पादन इसे Organic Farming Model Rajasthan का मजबूत स्तंभ बनाता है।
काली हल्दी: कम जमीन, ज्यादा मुनाफा
काली हल्दी सामान्य हल्दी की तुलना में कई गुना अधिक औषधीय गुणों से भरपूर होती है। आयुर्वेद, फार्मा और कॉस्मेटिक इंडस्ट्री में इसकी भारी मांग है। कम क्षेत्र में ज्यादा आमदनी देने वाली यह फसल Organic Farming Model Rajasthan में किसानों के लिए गेम-चेंजर साबित हो सकती है।
लेमन ग्रास और सुगंधित फसलें
लेमन ग्रास जैसी सुगंधित फसलें ईको डेरा मॉडल को और मजबूत बनाती हैं। इससे निकलने वाला तेल दवाइयों, एरोमा थेरेपी, साबुन और कॉस्मेटिक उद्योग में उपयोग होता है। साल में तीन-चार कटाई और लगातार बाजार उपलब्धता इसे स्थायी आय का साधन बनाती है।
दुर्लभ औषधीय फसलें और बाजार की मांग
राइटिया, चिरमी और गामकराया जैसी दुर्लभ औषधीय फसलें यह साबित करती हैं कि Organic Farming Model Rajasthan केवल प्रयोग नहीं, बल्कि भविष्य की खेती है। इन फसलों की मांग हर्बल और आयुर्वेदिक कंपनियों में लगातार बढ़ रही है।
राजस्थान जैसे शुष्क क्षेत्र के लिए वरदान
कम पानी, कम रासायनिक इनपुट और अधिक मूल्य—यही इस मॉडल की ताकत है।राजस्थान की जलवायु के अनुरूप यह मॉडल किसानों को जल संकट के बावजूद सुरक्षित आमदनी दे सकता है।
किसानों के लिए सीख और संदेश
हेमंत सिंह हैपावत कहते हैं— “खेती आज केवल आजीविका नहीं, बल्कि एक व्यवसाय है। सही फसल, सही तकनीक और सही बाजार समझ लिया जाए तो किसान आत्मनिर्भर बन सकता है।” यह सोच Organic Farming Model Rajasthan की आत्मा है।
सरकार और कृषि विभाग की भूमिका
यदि सरकार और कृषि विभाग इस तरह के मॉडल को प्रशिक्षण, मार्केट लिंक और सब्सिडी से समर्थन दें, तो राजस्थान को ऑर्गेनिक खेती में राष्ट्रीय पहचान मिल सकती है।
भविष्य का रोडमैप: ऑर्गेनिक हब की संभावना
यदि चांदसेन गांव का मॉडल आसपास के किसान अपनाते हैं, तो मालपुरा और टोंक क्षेत्र Organic Farming Model Rajasthan का बड़ा केंद्र बन सकता है।
खेती घाटे से समृद्धि तक
यह कहानी केवल एक व्यक्ति की सफलता नहीं, बल्कि राजस्थान के किसानों के लिए भविष्य का रोडमैप है।Organic Farming Model Rajasthan यह साबित करता है कि सही दिशा, सही सोच और सही फसल के साथ खेती आज भी सम्मान और समृद्धि दोनों दे सकती है।
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