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Naxalism End in India

Naxalism End in India: 42 दिन में 42 सरेंडर, अमित शाह की डेडलाइन से पहले ही लाल आतंक का खेल खत्म

Naxalism End in India अब सिर्फ एक राजनीतिक नारा नहीं, बल्कि ज़मीन पर दिखने वाली हकीकत बन चुका है। दशकों तक जंगलों में गूंजने वाली माओवादी बंदूकों की आवाज़ अब खामोश होती जा रही है। जिस लाल गलियारे को कभी देश की सबसे बड़ी आंतरिक सुरक्षा चुनौती माना जाता था, वह आज इतिहास बनने की कगार पर खड़ा है।

 

42 दिन, 42 सरेंडर—इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ

Naxalism End in India की दिशा में सबसे बड़ा संकेत पिछले 42 दिनों में देखने को मिला, जब MMC ज़ोन में 7 करोड़ 75 लाख रुपये के इनामी 42 नक्सलियों ने आत्मसमर्पण कर दिया। ये वही नक्सली थे, जो कभी जंगलों में समानांतर सरकार चलाते थे और सुरक्षाबलों के लिए सबसे बड़ी चुनौती माने जाते थे।

 

हिडमा की मौत: नक्सल इतिहास का सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट

माओवादी कमांडर माडवी हिडमा का नाम सुनते ही सुरक्षाबलों में हाई अलर्ट हो जाता था। देश के सबसे घातक हमलों का मास्टरमाइंड माना जाने वाला हिडमा तय 30 नवंबर की डेडलाइन से 12 दिन पहले ही ढेर कर दिया गया। यह सिर्फ एक एनकाउंटर नहीं था, बल्कि नक्सल इतिहास की दिशा बदल देने वाला मोड़ था।

 

अमित शाह की डेडलाइन और उससे पहले बदली ज़मीन की सच्चाई

साल 2024 में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने ऐलान किया था कि 31 मार्च 2026 तक भारत से नक्सलवाद खत्म कर दिया जाएगा। तब इसे बड़ा राजनीतिक दावा माना गया, लेकिन ज़मीनी कार्रवाई ने इस डेडलाइन को महज़ तारीख नहीं रहने दिया। डेडलाइन से लगभग 4 महीने पहले ही रेड कॉरिडोर के दो राज्यों ने खुद को नक्सल मुक्त घोषित कर दिया।

 

MMC ज़ोन में अब सिर्फ 6 नक्सली—कैसे टूटा गढ़

NDTV की रिपोर्ट के अनुसार मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ के जंक्शन वाले MMC ज़ोन में अब सिर्फ 6 नक्सली बचे हैं। रामधेर और अनंत जैसे बड़े नामों के सरेंडर के बाद छोटा दीपक भी दबाव में आया। अगले ही दिन बालाघाट में दीपक उइके और रोहित ने हथियार डाल दिए, जिससे यह ज़ोन लगभग खत्म हो गया।

 

नक्सल मुक्त होते राज्य और बदला हुआ रेड कॉरिडोर

Naxalism End in India का सबसे बड़ा प्रमाण यह है कि जिन इलाकों में कभी पुलिस कैंप बनाना भी मौत को दावत देना था, वहां आज बिना डर विकास की गाड़ियां दौड़ रही हैं। सड़कें, मोबाइल टावर, स्कूल और अस्पताल अब लाल आतंक की जगह विकास की पहचान बन रहे हैं।

 

बस्तर में अब कैसी है स्थिति

छत्तीसगढ़ के बस्तर इलाके में अब भी कुछ चुनौती बाकी है, लेकिन हालात पहले जैसे नहीं हैं। एक समय 12 हजार से ज्यादा हथियारबंद नक्सली सक्रिय थे, लेकिन अब सिर्फ गिने-चुने दस्ते ही बचे हैं और वे भी लगातार सुरक्षाबलों के दबाव में हैं।

 

अब बचे टॉप नक्सली चेहरे कौन हैं

Naxalism End in India के इस अंतिम दौर में कुछ नाम अभी भी सुरक्षाबलों की टारगेट लिस्ट में हैं।

इनमें बटालियन नंबर-1 का इंचार्ज 25 लाख का इनामी बारसे देवा उर्फ साईनाथ, और सेंट्रल कमेटी के बचे चार सदस्य शामिल हैं—मिसिर बेसरा, मल्लाराजी रेड्डी, थिपरी तिरूपति और हनुमंथू उर्फ गणेश उइके। इनमें कई बुज़ुर्ग और बीमार हैं, जो अब जंगलों में गुमनामी की ज़िंदगी जीने को मजबूर हैं।

 

सुरक्षाबलों की साफ रणनीति: सरेंडर या निर्णायक कार्रवाई

बस्तर रेंज के आईजी सुंदरराज पी के मुताबिक अब बचे कैडर के सामने सिर्फ दो ही रास्ते हैं—या तो हथियार डालकर मुख्यधारा में शामिल हो जाएं, या फिर सुरक्षाबलों की निर्णायक कार्रवाई का सामना करें। ऑपरेशन अब धीमे नहीं, बल्कि टारगेटेड और निर्णायक हो चुके हैं।

 

छत्तीसगढ़ ने नक्सल हिंसा की कितनी बड़ी कीमत चुकाई

Naxalism End in India की कीमत छत्तीसगढ़ ने सबसे ज्यादा चुकाई है।

25 सालों में—

  1. 3,404 मुठभेड़

  2. 1,541 नक्सली ढेर

  3. 1,315 जवान शहीद

  4. 1,817 निर्दोष नागरिकों की मौत

  5. 7,826 नक्सलियों ने सरेंडर

  6. 13,416 गिरफ्तार

ये आंकड़े बताते हैं कि नक्सलवाद का अंत क्यों जरूरी था।

 

तय समय से पहले खत्म होगा नक्सलवाद—संकेत साफ

हिडमा का खात्मा, करोड़ों के इनामी नक्सलियों का सरेंडर, नक्सल मुक्त राज्यों की घोषणा और जंगलों में सिमटते कैडर—ये सभी संकेत साफ बताते हैं कि Naxalism End in India अब अंतिम चरण में है। लाल गलियारा सिमट रहा है और जंगल अब डर नहीं, नए भारत की कहानी कह रहे हैं।

 

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