इटावा, संवाददाता: राजेन्द्र जैन
राजस्थान के कोटा जिले की इटावा तहसील अंतर्गत स्थित खातोली कस्बा इतिहास के एक ऐसे अध्याय का साक्षी है, जिसे आज भी पर्याप्त पहचान नहीं मिल पाई है। खातोली युद्ध 1517 का इतिहास भारतीय मध्यकालीन इतिहास की महत्वपूर्ण घटनाओं में से एक है, लेकिन यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि आज भी यह युद्ध स्थल सरकारी उपेक्षा का शिकार बना हुआ है।
राणा सांगा और इब्राहिम लोधी के बीच निर्णायक युद्ध
वर्ष 1517 ईस्वी में खातोली की धरती पर मेवाड़ के शासक महाराणा सांगा और दिल्ली सल्तनत के सुल्तान इब्राहिम लोधी के बीच भीषण युद्ध हुआ था। यह युद्ध उत्तर भारत की सत्ता संतुलन को बदलने वाला सिद्ध हुआ। ऐतिहासिक दस्तावेजों के अनुसार खातोली युद्ध 1517 के इतिहास में राणा सांगा ने इब्राहिम लोधी को पराजित कर बंदी बना लिया था।
युद्ध में राणा सांगा का बलिदान और शौर्य
इस युद्ध में महाराणा सांगा को गंभीर शारीरिक क्षति भी उठानी पड़ी। युद्ध के दौरान उनका एक हाथ और एक पैर क्षतिग्रस्त हो गया, लेकिन इसके बावजूद उन्होंने युद्ध भूमि नहीं छोड़ी। यह बलिदान राणा सांगा के अदम्य साहस और वीरता का प्रतीक है, जो आज भी भारतीय इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज है।
खातोली में मौजूद युद्ध स्थल और समाधियां
खातोली कस्बे में आज भी उस ऐतिहासिक युद्ध स्थल पर कई समाधियां मौजूद हैं, जो उस कालखंड की मूक साक्षी हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि ये समाधियां उन वीर योद्धाओं की स्मृति में बनी हैं, जिन्होंने इस युद्ध में प्राणों की आहुति दी। खातोली युद्ध 1517 का इतिहास इन स्थलों के माध्यम से आज भी जीवंत है, लेकिन संरक्षण के अभाव में ये धरोहरें नष्ट होने की कगार पर हैं।
ऐतिहासिक धरोहर को लेकर सरकारी उदासीनता
स्थानीय नागरिकों और इतिहास प्रेमियों का आरोप है कि सरकार ने खातोली की इस प्राचीन धरोहर को लेकर कभी गंभीरता नहीं दिखाई। न तो युद्ध स्थल को संरक्षित किया गया और न ही इसे आधिकारिक रूप से ऐतिहासिक धरोहर का दर्जा दिया गया। वर्षों से मांग के बावजूद प्रशासनिक स्तर पर कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया है।
स्थानीय लोगों की मांग: प्रतिमा और धरोहर दर्जा
खातोली कस्बे के लोग अब एकजुट होकर मांग कर रहे हैं कि कस्बे में महाराणा सांगा की भव्य प्रतिमा स्थापित की जाए। साथ ही युद्ध स्थल को राज्य या राष्ट्रीय स्तर की ऐतिहासिक धरोहर घोषित किया जाए। स्थानीय नागरिकों का मानना है कि इससे न केवल इतिहास का संरक्षण होगा, बल्कि क्षेत्र में पर्यटन को भी बढ़ावा मिलेगा।
इतिहास संरक्षण की जरूरत
खातोली युद्ध 1517 का इतिहास केवल एक युद्ध कथा नहीं, बल्कि भारतीय स्वाभिमान और शौर्य की पहचान है। यदि समय रहते इन स्थलों का संरक्षण नहीं किया गया, तो आने वाली पीढ़ियां इस गौरवशाली इतिहास से वंचित रह जाएंगी। इतिहासकारों का भी मानना है कि ऐसे युद्ध स्थलों को संरक्षित करना राष्ट्रीय जिम्मेदारी है।
खातोली कस्बा इतिहास के एक अमूल्य अध्याय का साक्षी है, लेकिन आज भी पहचान की प्रतीक्षा कर रहा है। राणा सांगा और इब्राहिम लोधी के बीच हुए इस ऐतिहासिक युद्ध को उचित सम्मान मिलना चाहिए। अब देखना होगा कि सरकार और प्रशासन स्थानीय जनता की मांगों को कितनी गंभीरता से लेता है और क्या खातोली को उसका ऐतिहासिक गौरव लौटाया जाता है या नहीं।
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