टोंक, संवाददाता: उमाशंकर शर्मा
आज के समय में जब युवा पीढ़ी आधुनिकता और सोशल मीडिया की चकाचौंध में अपनी सांस्कृतिक जड़ों से दूर होती जा रही है, ऐसे दौर में कृषा वैष्णव सनातन संस्कृति की बाल साधिका के रूप में सामने आई हैं। टोडारायसिंह उपखंड के भासू गांव की यह नन्ही बालिका महज 9 वर्ष की उम्र में भारतीय संस्कृति, संस्कार और साधना की सशक्त मिसाल बन चुकी हैं। कृषा वैष्णव सनातन संस्कृति से जुड़कर शास्त्रीय संगीत को केवल कला नहीं बल्कि साधना के रूप में अपनाए हुए हैं। उनकी यह यात्रा सिर्फ व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं, बल्कि भारतीय सांस्कृतिक चेतना के पुनर्जागरण का प्रतीक बन रही है।
77वें गणतंत्र दिवस पर ऐतिहासिक सम्मान
77वें गणतंत्र दिवस के अवसर पर जयपुर में आयोजित राज्य स्तरीय समारोह में कृषा वैष्णव सनातन संस्कृति की प्रतिनिधि के रूप में सम्मानित हुईं। इस गरिमामय आयोजन में उन्हें राज्यपाल हरिभाऊ बागडे, मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा एवं उपमुख्यमंत्री दिया कुमारी द्वारा शील्ड एवं प्रशस्ति पत्र प्रदान किया गया। यह सम्मान न केवल कृषा की प्रतिभा का प्रमाण है, बल्कि यह दर्शाता है कि आज भी भारतीय शासन व्यवस्था संस्कृति और साधना से जुड़ी बाल प्रतिभाओं को सर्वोच्च मंच प्रदान कर रही है।
सबसे कम उम्र की प्रतिभा बनी कृषा
इस समारोह की सबसे विशेष बात यह रही कि कृषा वैष्णव इस राज्य स्तरीय सम्मान को प्राप्त करने वाली सबसे कम उम्र की प्रतिभा रहीं। कार्यक्रम के दौरान एक अत्यंत भावुक क्षण तब देखने को मिला जब राज्यपाल, मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री ने प्रोटोकॉल से हटकर कृषा को मंच पर अपने पास बुलाया। उन्होंने न केवल कृषा से आत्मीय संवाद किया, बल्कि स्नेहपूर्वक आशीर्वाद भी दिया। यह दृश्य भारतीय संस्कृति में बाल प्रतिभाओं के प्रति सम्मान और संवेदनशीलता की जीवंत तस्वीर प्रस्तुत करता नजर आया।
शास्त्रीय संगीत और साधना की उपलब्धियां
महज 9 वर्ष की आयु में कृषा वैष्णव सनातन संस्कृति और शास्त्रीय संगीत की साधना से कई कीर्तिमान स्थापित कर चुकी हैं। उन्होंने अब तक 2 इंटरनेशनल अवॉर्ड अपने नाम किए हैं। इसके साथ ही कृषा एशिया बुक ऑफ रिकॉर्ड्स में एक बार और इंडिया बुक ऑफ रिकॉर्ड्स में 5 बार अपना नाम दर्ज करा चुकी हैं। इतनी कम उम्र में यह उपलब्धियां उनके कठोर अनुशासन, निरंतर अभ्यास और आध्यात्मिक साधना का प्रमाण हैं।
परिवार, संस्कार और संस्कृतिमूलक परवरिश
कृषा वैष्णव भासू गांव निवासी सेवानिवृत्त इंजीनियर रामनिवास वैष्णव की पोत्री हैं। उनके पिता डॉ. जयराज वैष्णव भीलवाड़ा मेडिकल कॉलेज में ईएनटी विभागाध्यक्ष के रूप में सेवाएं दे रहे हैं। परिवार की संस्कृतिमूलक सोच, अनुशासन और भारतीय मूल्यों से जुड़ी परवरिश ने कृषा वैष्णव सनातन संस्कृति की दिशा को मजबूत आधार प्रदान किया है। इस उपलब्धि पर पूरे क्षेत्र में हर्ष और गर्व का वातावरण है।
मां की तपस्या और बेटी की सफलता
कृषा की इस असाधारण सफलता के पीछे उनकी मां कृति वैष्णव की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही है। उन्होंने अपनी बेटी की प्रतिभा को निखारने के लिए अपने करियर की परवाह किए बिना त्याग, अनुशासन और निरंतर मेहनत को अपनाया। मां कृति का मानना है कि कृषा की साधना अभी प्रारंभिक चरण में है और आने वाले समय में वह और भी बड़े राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय कीर्तिमान स्थापित करेगी। यह मां-बेटी की तपस्या और समर्पण की प्रेरक कहानी है।
सनातन संस्कृति की जीवंत प्रतीक बनी कृषा
आज कृषा वैष्णव सनातन संस्कृति की केवल प्रतिनिधि नहीं, बल्कि उसकी जीवंत प्रतीक बन चुकी हैं। उनकी साधना यह संदेश देती है कि भारतीय संस्कृति आज भी जीवित है, बस उसे सहेजने और संवारने की जरूरत है। ऐसी प्रेरक खबरें आप enewsbharat.com के संस्कृति और शिक्षा सेक्शन में पढ़ सकते हैं।
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