देवली, संवाददाता: चेतन वर्मा
देवली उप जिला चिकित्सालय चिकित्सा व्यवस्था संकट ने मंगलवार को पूरे क्षेत्र को झकझोर कर रख दिया। देवली स्थित राजकीय उप जिला चिकित्सालय में उस समय अफरा-तफरी मच गई, जब प्रभारी चिकित्साधिकारी समेत अधिकांश डॉक्टर एक साथ छुट्टी पर चले गए। अस्पताल में इलाज की उम्मीद लेकर पहुंचे मरीजों को निराश होकर लौटना पड़ा। यह घटना न सिर्फ स्वास्थ्य सेवाओं की पोल खोलती है, बल्कि प्रशासनिक संवेदनहीनता को भी उजागर करती है।
एक साथ छुट्टी पर गए डॉक्टर, अस्पताल हुआ खाली
जानकारी के अनुसार अस्पताल में कार्यरत कुल 19 डॉक्टरों में से 11 डॉक्टर एक साथ अवकाश पर चले गए। इनमें प्रभारी चिकित्साधिकारी भी शामिल थे। छुट्टी पर गए अधिकांश डॉक्टरों ने वर्ष की अधिशेष आकस्मिक छुट्टियों का उपयोग किया, जो 31 दिसंबर को समाप्त हो रही थीं।
किन-किन विभागों की सेवाएं रहीं प्रभावित
छुट्टी पर गए डॉक्टरों में फिजिशियन, ऑर्थोपेडिक, शिशु रोग विशेषज्ञ और स्त्री रोग विशेषज्ञ शामिल थे। इन विभागों की अनुपस्थिति से गंभीर मरीजों, गर्भवती महिलाओं और बच्चों को सबसे अधिक परेशानी झेलनी पड़ी।
सोशल मीडिया पर वायरल हुई अनुपस्थित पंजिका
अस्पताल में लगे सूचना पट और अनुपस्थित पंजिका की तस्वीरें सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हुईं। इन तस्वीरों ने जनता के गुस्से को और भड़का दिया। लोग सवाल उठा रहे हैं कि जब मरीजों की जान दांव पर हो, तब डॉक्टरों का एक साथ छुट्टी पर जाना कितना जायज़ है।
मरीजों और आमजन का आक्रोश
मरीजों और उनके परिजनों ने कहा कि अगर डॉक्टर बारी-बारी से छुट्टी लेते, तो व्यवस्था बनी रह सकती थी। एक साथ छुट्टी लेकर उन्होंने अस्पताल को ही बीमार बना दिया। कई मरीजों को मजबूरी में निजी अस्पतालों की ओर रुख करना पड़ा।
प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग की भूमिका
सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि व्यवस्था संभालने वाले प्रभारी चिकित्साधिकारी भी छुट्टी पर चले गए। यह दर्शाता है कि अस्पताल में किसी प्रकार की वैकल्पिक व्यवस्था नहीं की गई थी, जो कि गंभीर प्रशासनिक चूक मानी जा रही है।
सीएमओ टोंक का बयान और संभावित कार्रवाई
मुख्य चिकित्सा अधिकारी टोंक ने कहा कि डॉक्टरों ने उनसे अवकाश की अनुमति नहीं ली है और पूरे मामले की जांच की जाएगी। वहीं उपखंड अधिकारी देवली से संपर्क करने का प्रयास किया गया, लेकिन उन्होंने फोन रिसीव नहीं किया।
क्या कहता है सरकारी अवकाश नियम
सरकारी नियमों के अनुसार आवश्यक सेवाओं से जुड़े विभागों में सामूहिक अवकाश की अनुमति नहीं होती। विशेषकर अस्पताल जैसी संस्थाओं में वैकल्पिक व्यवस्था अनिवार्य मानी जाती है। इस घटना ने इन नियमों की अनदेखी को उजागर किया है।
यह संकट क्यों गंभीर है
यह मामला पूरे राजस्थान की सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था पर सवाल खड़े करता है। अगर समय रहते कार्रवाई नहीं हुई, तो यह एक खतरनाक परंपरा बन सकती है, जिसका खामियाजा आम जनता को भुगतना पड़ेगा।
सिस्टम सुधार की जरूरत
इस घटना ने स्पष्ट कर दिया है कि स्वास्थ्य व्यवस्था में जवाबदेही तय करना बेहद जरूरी है। डॉक्टरों की जिम्मेदारी तय हो, अवकाश प्रणाली पारदर्शी हो और मरीजों के हित सर्वोपरि रखे जाएं — तभी ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकी जा सकती है।
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