बारां, संवाददाता: जयप्रकाश शर्मा
च्यवन ऋषि जन्मोत्सव मांगरोल में बसंत पंचमी के पावन अवसर पर श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाया गया। यह पर्व न केवल धार्मिक आस्था से जुड़ा है, बल्कि भारतीय संस्कृति और आयुर्वेदिक परंपरा की महान विरासत को भी दर्शाता है। च्यवन ऋषि को आयुर्वेद का प्रमुख आचार्य माना जाता है।
बसंत पंचमी पर पूजा-अर्चना और उत्सव
मांगरोल कस्बे सहित आसपास के क्षेत्रों में बसंत पंचमी के अवसर पर देवी सरस्वती की विधिवत पूजा-अर्चना की गई। स्कूलों में भी बसंत पंचमी का उत्सव उत्साह और उमंग के साथ मनाया गया। बच्चों और शिक्षकों ने सरस्वती वंदना कर ज्ञान और विद्या की कामना की।
ब्राह्मण समाज द्वारा विशेष आयोजन
कस्बे में बारेगामा ब्राह्मण समाज द्वारा बसंत पंचमी को च्यवन ऋषि जन्मोत्सव मांगरोल के रूप में मनाया गया। समाज भवन में महर्षि च्यवन ऋषि महाराज के चित्र पर माल्यार्पण किया गया और तिलक व आरती कर श्रद्धा अर्पित की गई।
च्यवन ऋषि और आयुर्वेद का योगदान
इस अवसर पर समाज के नव युवक मंडल अध्यक्ष हरिओम शर्मा ने च्यवन ऋषि जन्मोत्सव मांगरोल के महत्व पर प्रकाश डालते हुए बताया कि च्यवन ऋषि ने आयुर्वेद के माध्यम से समाज को स्वस्थ जीवन की दिशा दी। उन्होंने आयुर्वेद को जन-जन तक पहुंचाने का कार्य किया।
च्यवनप्राश की खोज और महत्व
हरिओम शर्मा ने बताया कि च्यवन ऋषि ने आयुर्वेद में च्यवनप्राश की खोज कर विश्व को अमूल्य स्वास्थ्य सूत्र दिया। आज भी घर-घर में च्यवनप्राश का उपयोग स्वास्थ्य, रोग प्रतिरोधक क्षमता और दीर्घायु के लिए किया जाता है। च्यवन ऋषि जन्मोत्सव मांगरोल इस महान योगदान को स्मरण करने का अवसर है।
समाज के युवाओं की सक्रिय भूमिका
आयोजन में समाज के युवाओं की सक्रिय भागीदारी देखने को मिली। युवाओं ने कार्यक्रम की व्यवस्थाओं में सहयोग किया और समाज की परंपराओं को आगे बढ़ाने का संकल्प लिया। च्यवन ऋषि जन्मोत्सव मांगरोल युवाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत बना।
बड़ी संख्या में समाजबंधुओं की उपस्थिति
कार्यक्रम में चंद्रप्रकाश शर्मा, जितेंद्र भार्गव, आदित्य व्यास, बंटी भार्गव, संजय भार्गव, स्वप्निल शर्मा, ओमप्रकाश शर्मा, अमित शर्मा, विशाल शर्मा, सुरेश भार्गव, रामबाबू शर्मा, नीतू भार्गव, सोनू व्यास, राघव, गोपाल, जतिन सहित बड़ी संख्या में ब्राह्मण समाज के बंधु उपस्थित रहे।
आस्था, संस्कृति और परंपरा का संगम
च्यवन ऋषि जन्मोत्सव मांगरोल आस्था, संस्कृति और सामाजिक एकता का प्रतीक बनकर उभरा। कार्यक्रम ने समाज को अपनी जड़ों से जोड़ने और भारतीय ज्ञान परंपरा को सहेजने का संदेश दिया।
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